मध्य प्रदेश के नरसिंगपुर जिले की माटी के मूर्धन्य साहित्यकार स्वर्गीय डॉक्टर रमेश कुमार बुधौलियाजी द्वारा रचित ‘गीता ज्ञानप्रभा’ ग्रंथ एक अमूल्य ,धार्मिक साहित्यिक धरोहर है, जिसमे डॉक्टर साहब द्वारा ज्ञानेश्वरीजी महाराज रचित ज्ञानेश्वरी गीता का भावानुवाद
किया है, श्रीमद्भगवतगीता के 700 संस्कृत श्लोकों को गीता ज्ञान प्रभा में 2868 विलक्ष्ण छंदों में समेटा गया है।
उन्ही के द्वारा श्रीमद्भगवतगीता महाकाव्य की छंदोंमयी श्रंखला ‘गीता ज्ञान प्रभा ‘ धारावाहिक की 43 वी कड़ी ..
तृतीयोऽध्यायः- ‘कर्म योग’
‘कर्म योग या कार्य की पध्दति’
श्लोक (३७)
भगवानुवाच :-
हे अर्जुन सुनो बताता हूँ, विषयों में बैरी काम रहा,
उत्पन्न रजोगुण से होकर, यह काम स्वयं ही क्रोध रहा ।
यह काम अघाता नहीं कभी भोगों में रहा अघोरी है,
पापी से बढ़कर पापी है, भूखा नित, भूख न थोरी है ।
कितना भी भोगे भोग मगर, इसकी न तृप्ति होने पाती,
ईंधन से आग बढ़े जैसे, इसकी तृष्णा बढ़ती जाती ।
यह सभी अनर्थों का कारण, पापों में प्रवृत कराता है,
आसक्ति बढ़ाकर भोगों में, मानव को पतित बनाता है ।
इसको तू अपना शत्रु समझ, यह दुख का कारण बनता है,
कल्याण मार्ग से खींच खींच, यह बरबस पथच्युत करता है ।
ईश्वर तो परम दयालु है,वह पापों में क्यों डालेगा ?
प्रारब्ध पूर्व-कृत-कर्म-भोग वह निष्क्रिय किसे सतायेगा ?
अन्तस में बसते काम क्रोध, पापों में प्रवृत्त कराते हैं,
ये दया भाव से शून्य रहें बस पापाचार बढ़ाते हैं ।
ये नाग रहे मानो रक्षा करते ज्यों ज्ञान-रूप मणि की,
या शेर बाघ जंगल के हैं या बाधा जटिल भक्ति-पथ की।
ये देह दुर्ग के पत्थर हैं, ये कोट इन्द्रियों के गढ़ के,
ये भ्रान्ति करें उत्पन्न नई,ये नये नये कौतुक गढ़ते ।
अपना दबाव अपना प्रभाव फैलाते जाते दूर दूर,
ले साथ अविद्या का मोहक कर देते सत को चूर चूर ।
सम्पन्न रजोगुण से रहकर ये मूल तामसी भाव रखें,
फैलाते ऐसा इन्द्रजाल, साधक भी इनसे नहीं बचे ।
अपना प्रमाद, अज्ञान, मोह, ज्यो दिया तमोगुण ने सारा,
ये जीवन के हैं शत्रु, मृत्यु का नगर रहा इनको प्यारा।
ये ऐसे भूखमरे हैं, सारा विश्व न ग्रास बराबर है,
इनकी झूठी आशा ऐसी, जिसका तिलिस्म जैसा घर है।
आशा की छोटी बहिन भ्रान्ति चौदह भुवनों तक छा जाये,
तृष्णा का कोई अन्त नहीं, जो कुछ पा जाये, खा जाये ।
इन काम-क्रोध की बड़ी प्रतिष्ठा रही मोह की नगरी में,
नचता संसार इशारे पर, उस अहंकार की डगरी में
कर दम्भ-भाव से मिली भगत, ये सार सत्य का हर लेते,
उसमें असत्यता का अपनी, चुपके से भूसा भर देते ।
ये शान्ति स्वरूपा वन-कन्या के वस्त्रों का अपहरण करें,
माया डोमिन को भूषित कर, भोली दुनिया को बहुत ठगें।
घायल विवेक को ये कर दें वैराग्य पिटे इनके कारण,
उपशम की गर्दन ये तोड़े, साधें भटकें इनके कारण ।
सन्तोष-वाग उजड़े, उकटे, धीरज के कोट गिरें नीचे,
सूखे जल श्रम की सरिता का, बस रेत रेत के हो नीचे ।
पौधे न ज्ञान के ऊग सकें, रह सके न सुख का नाम कहीं,
हो त्रिविध ताप का दाह, प्रबल,व्याकुल हो प्राणी सभी कहीं ।
ये साथ जीव के जुड़ जाते, ये ज्ञान-पंक्ति में जुड़ जाते,
ये ऐसे मायावी होते, सहसा, न पकड़ में ये आते ।
इनके ही कारण महाप्रलय होता है, रोक न हो पाती,
जल के बिन जगत डुबा दें ये, धरती बिन आग दहक जाती।
ग्रस लेते हैं ये प्राणी को, उसको न पता होने पाता,
ये शस्त्र बिना घायल करते, बिन रस्सी के जन बँध जाता।
कीचड़ बिन जड़े जमा लेते बिन पाश बाँधकर रखते है,
भीतर शरीर के गहरे ये गहरे में बहुत पहुंचते हैं ।
श्लोक (३८)
बिन काम क्रोध के शुद्ध ज्ञान, दिखता है नहीं कहीं अर्जुन,
होता है ज्ञान जहाँ रहता है काम क्रोध का आच्छादन ।
चन्दन आवृत ज्यों विषधर से, ज्यों गर्भ जेर से ढँका रहे,
ज्यों बिना धुएँ के अग्नि नहीं, ज्यों बीज कवच से ढँका रहे।
हे अर्जुन जहाँ ज्ञान होता, ये काम-क्रोध आ जाते हैं,
जिस तरह न पारे बिन दर्पण, ये ज्ञान साथ छा जाते हैं ।
मन्मथ को अनल समान समझ, जिसमें न तृप्ति का भाव रहा,
ईंधन घृत जितना मिला इसे उतना ही इसका वेग बढ़ा ।
दुष्पूर रहा यह, विषयों में, इसकी भारी आसक्ति रही,
विषयों का ईंधन चुक जाता, हो पाती इसकी पूर्ति नहीं । क्रमशः…