मध्य प्रदेश के नरसिंगपुर जिले की माटी के मूर्धन्य साहित्यकार स्वर्गीय डॉक्टर रमेश कुमार बुधौलियाजी द्वारा रचित ‘गीता ज्ञानप्रभा’ ग्रंथ एक अमूल्य ,धार्मिक साहित्यिक धरोहर है, जिसमे डॉक्टर साहब द्वारा ज्ञानेश्वरीजी महाराज रचित ज्ञानेश्वरी गीता का भावानुवाद
किया है, श्रीमद्भगवतगीता के 700 संस्कृत श्लोकों को गीता ज्ञान प्रभा में 2868 विलक्ष्ण छंदों में समेटा गया है।
उन्ही के द्वारा श्रीमद्भगवतगीता महाकाव्य की छंदोंमयी श्रंखला ‘गीता ज्ञान प्रभा ‘ धारावाहिक की ४२ वी कड़ी ..
तृतीयोऽध्यायः- ‘कर्म योग’
‘कर्म योग या कार्य की पध्दति’
श्लोक (34)
विषयों में सभी इन्द्रियों के छिपकर बैठे हैं राग द्वेष,
कल्याण मार्ग के प्रबल शत्रु,ये विघ्न करें पैदा अनेक ।
इन दोनों के वश में न रहे तो हित अपना कर पाता है,
चक्कर में इनके पड़ा मनुज जीवन का सार गँवाता है।
श्लोक (35)
आगम निगमों के नियत कर्म ही सबके लिए स्वधर्म रहे,
आवश्यक होता है सबको, पालन स्वधर्म का मनुज करे।
ब्राह्मण क्षत्रिय या वैश्य शूद्र, इनके अपने हैं अलग कर्म,
वे विहित कर्म ही पालन को बन जाते हैं उनका स्वधर्म ।
चाहे जितना गुण रहित लगे, पर अपना धर्म रहा उत्तम,
हो धर्म दूसरे का अच्छा, पर उचित नहीं उसका धारण ।
भय का कारण परधर्म बने, कल्याण किया करता स्वधर्म,
मरना भी पड़े स्वधर्म हेतु तो सर्वोत्तम वह रहा कर्म ।
क्षत्रिय का धर्म युद्ध करना, व्यापार वैश्य का धर्म रहा,
इनमें न अहिंसा शान्ति रही, हिंसा का ही व्यवहार रहा।
ब्राह्मण के शान्ति पूर्ण कर्मों की तुलना में ये गुणविहीन,
लेकिन स्वधर्म होता स्वधर्म वह नहीं अन्य से रहा दीन ।
श्लोक (३६)
अर्जुन उवाच :-
भगवन, स्वधर्म पालन में ही, कल्याण निहित यह समझ लिया,
परधर्म, निषिद्ध कर्म का भी, परित्याग उचित यह समझ लिया।
लेकिन मनुष्य को पापों में, हे केशव, कौन लगाता है ?
अनचाहे उससे पाप कर्म, बलपूर्वक कौन कराता है ?
ज्ञानीजन आत्मवृत्ति वाले हो पतित गलत पथ पर चलते,
है भले-बुरे का ज्ञान उन्हें, फिर भी अपना सत-पथ तजते ।
क्या उचित रहा अथवा अनुचित उनको इसकी पहिचान रही,
फिर भी परधर्म ग्रहण करके, क्यों राह उन्होंने गलत गही ?
जिन विषयों के प्रति घृणा रही, भगवन्, उनसे क्यों जुड़ जाते ?
किससे बलात हाँके जाकर, दल दल में फँसने मुड़ जाते ?
हे कृष्ण प्रबल वह कौन, मनुज को, जो प्रतिकूल चलाता है ?
जो इच्छा के विपरीत विवश उससे दुष्कृत्य कराता है ?
क्या परमेश्वर ही लोगों को, पापों में करता है नियुक्त ?
इस कारण सम्भव नहीं कि वह हो पाये पापों से विमुक्त।
अथवा प्रारब्ध रहा कारण जो करने पाप बाध्य करता,
या कारण रहा दूसरा कुछ, मानव जिससे परवश बनता ? क्रमशः…