‘गीता ज्ञान प्रभा ‘ धारावाहिक ..40

मध्य प्रदेश के नरसिंगपुर जिले की माटी के मूर्धन्य साहित्यकार स्वर्गीय डॉक्टर रमेश कुमार बुधौलियाजी द्वारा रचित ‘गीता ज्ञानप्रभा’ ग्रंथ एक अमूल्य ,धार्मिक साहित्यिक धरोहर है, जिसमे डॉक्टर साहब द्वारा ज्ञानेश्वरीजी महाराज रचित ज्ञानेश्वरी गीता का भावानुवाद किया है, श्रीमद्भगवतगीता के 700 संस्कृत श्लोकों को गीता ज्ञान प्रभा में 2868 विलक्ष्ण छंदों में समेटा गया है।

उन्ही के द्वारा श्रीमद्भगवतगीता महाकाव्य की छंदोंमयी श्रंखला ‘गीता ज्ञान प्रभा ‘ धारावाहिक की 40 वी कड़ी ..

तृतीयोऽध्यायः- ‘कर्म योग’

             ‘कर्म योग या कार्य की पध्दति’

श्लोक (२६)

बांछित है ज्ञानी पुरुषों को, वे शास्त्र विहित कर्तव्य करें,

आसक्ति कर्म में रखते जो, उनमें मत भ्रम उत्पन्न करें ।

परमात्म तत्त्व को पाये वे, कर्मों से विरत न करें उन्हें,

पैदा न अश्रद्धा हो उनमें, ज्ञानी सद प्रेरित करें उन्हें ।

 

अपने जैसा कर्त्तव्य बोध, उनके मन में भी उपजायें,

श्रद्धा विश्वास लगन से वे, जो विहित कर्म करने पायें ।

यदि फल की इच्छा नहीं रही तो आवश्यक है कर्म नही,

अज्ञानी पुरुषों में ऐसा, हो जाये भ्रम उत्पन्न नहीं ।

 

जिसका न शुद्ध हो गया चित्त, नैष्कर्म ज्ञान के योग्य नहीं,

पकवान दुधमुँहे बच्चे को देना क्या होगा उचित कहीं ।

जिस कर्म मार्ग के योग्य रहा, वह उस पर चल सत्कर्म करे,

ज्ञानी बहुरुपिया जैसा ही अपने स्वांगों में नहीं रचे ।

 

कर्तव्य करें खुद करवायें, पर कर्मत्याग की बात न हो,

ज्ञानी जन को यह उचित रहा, उनसे न कर्म का विचलन हो ।

श्लोक (२७)

है कर्म वही पर अज्ञानी को कर्म भार हो जाता है,

क्या गर्दन दुखती नहीं शीश पर जब वह भार उठाता है।

कर्ता बन जाता कर्मों का, वह अहंकार में हुआ चूर,

सब कार्य प्रकृति के गुण करते, इस परम सत्य से हुआ दूर।

 

सम्पूर्ण कर्म हो रहे स्वयं, कर रहे प्रकृति के गुण उनको,

पर शुद्ध नहीं अन्तस जिसका, वह देख नहीं पाता इसको ।

वह अहंकार से मोहित हो, निज को माने कर्त्ता उनका,

मैं कर्ता अपने कर्मों का’ अज्ञानी यह माना करता ।

श्लोक (२८)

गुण-कर्म रहे अन्योन्याश्रित, यह तथ्य सांख्य योगी जाने,

देहाभिमान से रहित रहा, कर्ता न स्वयं को वह माने ।

अर्जुन गुण-कर्म विभागों में, विस्तार प्रकृति का होता है,

जो इतना तथ्य जान लेता, आसक्त न उनमें होता है।

 

कर रहे गुणों में गुण वर्तन, जो भली भाँति इसको समझे,

समबुद्धि रहे जंजालो में, वह नहीं कभी उनमें उलझे ।

यह रही विलक्षणता उसकी, जो ज्ञानी रहा साँख्य योगी,

गुण और कर्म में अनासक्त, रह कर्म करे ऐसा योगी ।

 

जिस तरह सूर्य देकर प्रकाश, आलोकित अग जग को करता,

लेकिन जग के क्रिया-कलाप, क्या रहे न वह, उनसे जुड़ता ।

धारण करता शरीर ज्ञानी, पर तन कर्मों से बँधे नहीं,

हो रहे प्रकृति के कर्म सहज, जिनमें उसकी आसक्ति नहीं ।

 

रहते आधीन प्रकृति के जो, संगत में जो गुण की, रहता,

इन्द्रिय गुण के आधीन रहे, क्या निरासक्त वह जन रहता ?

कर रही इन्द्रियाँ काम सभी, आधीन गुणों के सब अपना,

पर कर्त्ता बनकर व्यर्थ भार अज्ञानी बढ़ा चलें अपना ।

श्लोक (२९)

वे सांसारिक सुख से बढ़कर, कुछ नहीं जानते जीवन में,

भोगों से पाने छुटकारा, आता न भाव उनके मन में ।

वे अल्पबुद्धि भोगों को ही, जीवन का सार समझते हैं,

उनके पथ से ज्ञानी जन उनको, विचलित कभी न करते हैं।

 

मोहित वे प्रकृति गुणों से हो, गुण-कर्मों में आसक्त रहें,

सुख भोग लक्ष्य ले जीवन का, वे नहीं राह अपनी बदलें ।

ज्ञानी जन उनको समझाकर, ला पाते जरा न परिवर्तन,

इसलिए उचित यह ज्ञानी को, वे चलने दें, उसका जीवन ।

 

ज्ञानी रह सजग कर्म करता, अज्ञानी से करवाता है,

पर कर्मासक्त मनुष्यों को, नैष्कर्म न वह सिखाता है ।

इस तरह कर्म अनिवार्य रहा, कर कर्मयोग का प्रतिपादन,

दृढ़ निश्चय युद्ध हेतु करने, कहते अर्जुन से मधुसूदन । क्रमशः…