‘गीता ज्ञान प्रभा ‘ धारावाहिक ..39

मध्य प्रदेश के नरसिंगपुर जिले की माटी के मूर्धन्य साहित्यकार स्वर्गीय डॉक्टर रमेश कुमार बुधौलियाजी द्वारा रचित ‘गीता ज्ञानप्रभा’ ग्रंथ एक अमूल्य ,धार्मिक साहित्यिक धरोहर है, जिसमे डॉक्टर साहब द्वारा ज्ञानेश्वरीजी महाराज रचित ज्ञानेश्वरी गीता का भावानुवाद किया है, श्रीमद्भगवतगीता के 700 संस्कृत श्लोकों को गीता ज्ञान प्रभा में 2868 विलक्ष्ण छंदों में समेटा गया है।

उन्ही के द्वारा श्रीमद्भगवतगीता महाकाव्य की छंदोंमयी श्रंखला ‘गीता ज्ञान प्रभा ‘ धारावाहिक की 39 वी कड़ी ..

तृतीयोऽध्यायः- ‘कर्म योग’

             ‘कर्म योग या कार्य की पध्दति’

श्लोक (२२)

अर्जुन न दूर की बातें अब, अपनी ही बात बताता हूँ,

है शेष मुझे कर्तव्य कौन, क्या वस्तु न जिसको पाता हूँ ?

कर्तव्य न तीनों लोकों में, करने को मेरे लिए कहीं,

पाना चाहूँ जो वस्तु, कौन सी है, जो मुझको मिले नहीं ?

 

तो भी मैं करता कर्म पार्थ, कर्मों का त्याग न उचित कभी,

रख दृष्टि लोक संग्रह की ही करना होते हैं कर्म सभी ।

मुझ पर निर्भर जग के प्राणी, परमार्थ स्वार्थ मुझपर निर्भर,

जो राह महाजन गढ़ देते, गन्तव्य मिले उस पर चल कर

 

इसलिए कि श्रेष्ठ पुरुष जग के, अपना कर्तव्य निभाते है,

उनके पीछे चलकर साधक, साधें सार्थक कर पाते हैं ।

प्रभु भी ज्ञानी जैसे अपने, कर्तव्य निभाया करते हैं,

कल्याण लोक का हो, इसका वे ध्यान हमेशा रखते हैं ।

श्लोक (२३)

यदि पार्थ कदाचित कर्मों में, वर्तन न करूँ रह सावधान,

तो हानि बड़ी हो सकती है, हो सकता है विघटन महान ।

जो मेरा मार्ग उसी का ही, कर रहे अनुसरण मनुज सभी,

इसलिए सजग रहना पड़ता, हो सकी न मुझसे भूल कभी ।

श्लोक (२४)

कहते हैं जगदाधार मुझे, वे ईश्वर मुझे समझते हैं,

जब अनाचार बढ़ने लगता, वे मुझसे आशा रखते हैं ।

इसलिए न यदि मैं कर्म करूँ तो नष्ट-भ्रष्ट जग हो जाए,

संकरता का कारण होऊँ, धार्मिकता जग की खो जाए।

 

गड़बड़ हो जाये सृष्टि चक्र, पालक मैं ही घालक होऊँ,

अपमिश्रण से हो नष्ट प्रजा, मैं ही उसका कारण होऊ ।

जिनके जो धर्म सभी छूटे, हो घाल मेल संकरता का,

यदि शुद्धि नहीं रह गई शेष, तो सत्व कहाँ जी का बचता?

श्लोक (२५)

आसक्ति स्वार्थ लिप्सा बढ़कर, कर्तव्य कर्म का नाश करे,

जब भले-बुरे का भेद मिटे तो कैसे जग जीवन सँवरे ।

श्रद्धा विहीन क्या शास्त्र विहित, कर्मों का कर पायें पालन ?

यदि हुआ न लोक संग्रह तो बस, विघटन का फिर होगा विघटन ।

 

इसलिये पुरुष जो सक्षम हैं, अर्जुन, वे धर्माचरण करें,

कल्याण लोक का हो जिससे, ऐसा अपना उद्देश्य रखें।

मैं भी स्वधर्म का पालन कर, कर रहा आचरण उन जैसा,

मुझ पर निर्भर जग के प्राणी, मैं उन्हें न भ्रष्ट होने देता ।

 

निष्काम हुए आनन्द मग्न, यदि धर्माचरण न कर पाये,

तो भवसागर में फँसी प्रजा को कहाँ सहारा मिल पाये ?

इसलिए समर्थ सामर्थ्यवान जो, वे न कर्म का करें त्याग,

हो सके लोक संग्रह उनसे, इसका रखना होता विचार ।

 

आसक्त कर्म में कर्म करे, जिस तरह पार्थ जन अज्ञानी,

वैसे ही कर्म निरत होवे, विद्वान पुरुष जो निष्कामी ।

कल्याण लोक का करने को, उनको आदर्श दिखाना है,

साधारण जन बनकर, उनको भी अपना कर्म निभाना है।

 

हो सके लोक संग्रह संचय जिससे, करना उनको स्वधर्म पालन,

ज्यों माता अपने बेटे का, करती रुचि से लालन-पालन ।

बनना है दीपस्तम्भ उन्हें, भूले भटके जन-मानस का,

वैशिष्ट्य नहीं दर्शाना है, दर्शाना है साधारणता ।

 

इसलिए कि लोक-संग्रह करने, श्रेष्ठों को कर्म निभाना है,

करने को कर्म न हों, बाकी कर्तव्य किए पर जाना है । क्रमश …