पातालकोट जमीन कांड: रक्षक ही भक्षक ? एसटी कमीशन के हंटर से हिली मप्र की नौकरशाही, अब रजिस्ट्री नहीं… ‘साहब’ की ‘पावर’ पर चलेंगे कानूनी हंटर !
(तामिया महाफर्जीवाड़े पर विशेष खोजी रिपोर्ट — कड़ी-3)
छिंदवाड़ा/ तामिया के चौरापठार (पातालकोट) में आदिवासियों की करोड़ों की जमीन को ‘कौड़ियों’ के दाम समेटने वाले रसूखदार नौकरशाहों के गिरेबान तक कानून के हाथ पहुंचने लगे हैं। इस महाघोटाले की गूंज अब देश की राजधानी दिल्ली तक जा पहुंची है। राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग ने मामले का कड़ा संज्ञान लेते हुए मध्य प्रदेश के मुख्य सचिव और छिंदवाड़ा कलेक्टर को कड़ा नोटिस जारी कर 30 दिनों के भीतर पूरी रिपोर्ट तलब कर ली है।
आयोग ने साफ चेतावनी दी है कि यदि 30 दिन में मुकम्मल जवाब नहीं मिला, तो Article 338A के तहत कड़ा समन जारी कर साहबों को दिल्ली दरबार में व्यक्तिगत रूप से हाजिर होना पड़ेगा।
इस बीच, कलेक्टरेट की कार्रवाई के डर से तात्कालिक एसडीएम कामिनी ठाकुर को जुन्नारदेव से हटाकर छिंदवाड़ा अटैच कर दिया गया है। वहीं प्रशासनिक सूत्रों का दावा है कि आरोपी तहसीलदार और बीएमओ ने अपने जवाब में यह स्वीकार कर लिया है कि उन्होंने जमीन खरीदने से पहले कोई प्रशासनिक अनुमति नहीं ली थी।
राकेश प्रजापति
कानूनी यक्ष प्रश्न: सवाल यह नहीं कि जमीन किसने खरीदी, सवाल ‘प्रशासनिक हैसियत’ के रसूख का है !
इस पूरे मामले में प्रशासनिक अमला अब तक ‘रजिस्ट्री के कागजात सही होने’ का ढोल पीट रहा है। लेकिन कानून की नजर में असली सवाल कुछ और ही हैं। कानूनी पहलुओं में मूल प्रश्न यह बिल्कुल नहीं है कि किसी अधिकारी के पिता, रिश्तेदार या स्वयं अधिकारी जमीन खरीद सकते हैं या नहीं।
सबसे बड़ा कानूनी सवाल:
“क्या जिस क्षेत्र में ये अधिकारी पदस्थ थे, वहां उन्होंने अपनी प्रशासनिक शक्ति, पद के प्रभाव और गोपनीय जानकारियों का उपयोग इस बेशकीमती भूमि को अर्जित करने के लिए किया या नहीं ?”
विवादित भूमि सौदों में तत्कालीन एसडीएम के पिता (दिलीप सिंह), तत्कालीन बीएमओ (जितेन्द्र शाह) स्वयं तथा तत्कालीन प्रभारी तहसीलदार के रिश्तेदार (उमराज की धर्मी) सीधे तौर पर लाभार्थी के रूप में सामने आए हैं। यदि यह तथ्य सही हैं, तो जांच की सुई सिर्फ कागजों पर नहीं, बल्कि इन सौदों के दौरान संबंधित अधिकारियों की प्रशासनिक भूमिका और उनके प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष प्रभाव पर टिकनी चाहिए।
क्यों यह मामला केवल ‘जमीन का सौदा’ नहीं, बल्कि ‘क्रिमिनल सिंडिकेट’ है ?
यह मामला जितना सीधा दिख रहा है, कानूनी रूप से उतना ही संगीन है। इस पूरे खेल में चार बड़े कानूनी उल्लंघन साफ दिखाई दे रहे हैं:
1. हितों का टकराव : भारतीय प्रशासनिक व्यवस्था का मूल सिद्धांत है कि कोई भी अधिकारी ऐसा निर्णय या प्रक्रिया का हिस्सा न बने, जिससे उसे या उसके परिवार को प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष लाभ पहुंचे। यदि कोई अधिकारी उस क्षेत्र में पदस्थ है जहां भूमि का राजस्व रिकॉर्ड, नामांतरण (Mutation) और सीमांकन उसके नियंत्रण में आता है, और उसी दौरान उसके परिवार के नाम भूमि खरीदी जाती है, तो यह ‘कॉन्फ्लिक्ट ऑफ इंटरेस्ट’ का सबसे गंभीर और सीधा मामला है।
2. पद का दुरुपयोग : पातालकोट का चौरापठार एक वैश्विक पर्यटन स्थल के रूप में उभर रहा है। यदि जांच में यह सामने आता है कि इस भूमि की वास्तविक स्थिति, प्रस्तावित पर्यटन योजनाओं या अन्य सरकारी प्रोजेक्ट्स की गोपनीय जानकारी का उपयोग इन अधिकारियों ने अपने निजी स्वार्थ के लिए किया, तो यह सीधे तौर पर पद के दुरुपयोग की श्रेणी में आता है।
3. भ्रष्टाचार निवारण कानून : यदि यह साबित हो जाए कि किसी अधिकारी ने अपने पद और प्रभाव का इस्तेमाल कर स्वयं या अपने परिजनों को अनुचित लाभ पहुंचाया, तो यह महज सिविल मामला नहीं रह जाता। यह ‘भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम’ के तहत सीधे तौर पर गैर-जमानती और जांच योग्य अपराध बनता है।
4. बेनामी लेन-देन : यदि किसी अधिकारी के प्रभाव क्षेत्र में किसी रिश्तेदार या तीसरे व्यक्ति के नाम पर संपत्ति खरीदी गई है और उसका वास्तविक आर्थिक लाभ किसी अन्य को मिल रहा हो, तो इस मामले में ‘बेनामी लेन-देन निषेध अधिनियम’ के तहत भी जांच का शिकंजा कसना तय है।
कटघरे में क्रेडिबिलिटी:
प्रशासनिक नैतिकता और कानून का स्थापित सिद्धांत कहता है कि यदि किसी राजस्व मामले में अधिकारी या उसके परिवार का हित जुड़ा हो, तो अधिकारी को उस फाइल और प्रक्रिया से स्वयं को पूरी तरह अलग (Recuse) कर लेना चाहिए।
जांच एजेंसियों को अब इन 4 कड़वे सवालों के जवाब ढूंढने होंगे:
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पद की टाइमिंग: जिस वक्त जमीन की रजिस्ट्री और फर्जी बंटवारे का खेल हुआ, उस समय ये संबंधित अधिकारी किन-किन कुर्सियों पर विराजमान थे?
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अधिकार क्षेत्र: क्या विवादित भूमि से जुड़े राजस्व प्रकरण, नामांतरण और सीमांकन सीधे तौर पर उनके या उनके अधीनस्थों के अधिकार क्षेत्र में थे?
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फाइल पर दस्तखत: क्या उन्होंने पर्दे के पीछे से किसी फाइल, नामांतरण, या आनन-फानन में की गई अनुमति प्रक्रिया में कोई भूमिका निभाई?
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नैतिक दूरी: क्या उन्होंने लिखित में खुद को इस शासकीय प्रक्रिया से अलग घोषित किया था?
किस दिशा में घूमनी चाहिए जांच की सुई ?
कलेक्टर साहब! केवल यह देख लेना कि “रजिस्ट्री वैध है या नहीं”, आदिवासियों के साथ न्याय नहीं होगा। यह तो केवल घाव पर पट्टी बांधने जैसा है। यदि वास्तव में आदिवासियों को उनका हक दिलाना है, तो जांच की दिशा इन बिंदुओं पर केंद्रित होनी चाहिए:
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बाजार मूल्य बनाम रजिस्ट्री मूल्य: पातालकोट व्यू पॉइंट की करोड़ों की जमीन का वास्तविक बाजार मूल्य (Market Value) क्या था और उसे महज 6 लाख या 13 लाख की रजिस्ट्री वैल्यू पर कैसे समेट दिया गया? आर्थिक घाटा किसका हुआ?
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बंटवारे का पक्षपात: 22 एकड़ जमीन में से ‘स्वर्ग’ जैसा दिखने वाला व्यू पॉइंट वाला हिस्सा ही क्यों रामदास भारती के नाम पर आनन-फानन में दर्ज किया गया, जिससे साहबों को जमीन खरीदनी थी? बाकी वारिसों को बेजान जमीन क्यों दी गई?
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आर्थिक लाभ का रूट: रजिस्ट्री के तुरंत बाद या उससे पहले क्या संबंधित अधिकारियों या उनके परिवार के बैंक खातों में कोई संदिग्ध लेन-देन हुआ?
खबरद्वार का निष्कर्ष :
यह मामला अब तामिया के एक छोटे से चौराहे से निकलकर देश के सबसे बड़े आदिवासी आयोग की दहलीज पर खड़ा है। यह केवल जमीन के एक टुकड़े की खरीद-फरोख्त का मामला नहीं है, बल्कि यह आम जनता के प्रशासनिक निष्पक्षता और जनविश्वास पर हुए डाके का है।
यदि प्रशासनिक नियंत्रण रखने वाले साहब ही अपने प्रभाव क्षेत्र में आदिवासियों की जमीनें औने-पौने दाम पर निगलने लगेंगे, तो व्यवस्था से ‘न्याय’ शब्द का अस्तित्व ही खत्म हो जाएगा। अब देखना यह है कि एसटी कमीशन के इस 30 दिनों के अल्टीमेटम के बाद छिंदवाड़ा का प्रशासनिक तंत्र सच को सामने लाता है, या फिर अपने ही ‘बिरादरी’ के दागी अफसरों को बचाने के लिए नए कागजी पैंतरे तैयार करता है!