मध्य प्रदेश के नरसिंगपुर जिले की माटी के मूर्धन्य साहित्यकार स्वर्गीय डॉक्टर रमेश कुमार बुधौलियाजी द्वारा रचित ‘ गीता ज्ञानप्रभा ’ ग्रंथ एक अमूल्य ,धार्मिक साहित्यिक धरोहर है, जिसमे डॉक्टर साहब द्वारा ज्ञानेश्वरीजी महाराज रचित ज्ञानेश्वरी गीता का भावानुवाद
किया है, श्रीमद्भगवतगीता के 700 संस्कृत श्लोकों को गीता ज्ञान प्रभा में 2868 विलक्ष्ण छंदों में समेटा गया है।
उन्ही के द्वारा श्रीमद्भगवतगीता महाकाव्य की छंदोंमयी श्रंखला ‘गीता ज्ञान प्रभा ‘ धारावाहिक की ४४ वी कड़ी ..
तृतीयोऽध्यायः- ‘कर्म योग’
‘कर्म योग या कार्य की पध्दति’
श्लोक (३९)
योँ ज्ञान भले ही शुद्ध रहे, पर काम क्रोध से ढँक जब जाता,
तक न मुकुर की धूल हटे, तब तक न ज्ञान मिलने पाता।
पर इन्हें जीतना सरल नहीं, जो यत्न, सहायक हैं उनके,
ईंधन से आग बुझाओ तो, वह और तेज होकर धधके |
ये बैरी रहे ज्ञानियों के, ये रहे अधोगति के कारण,
इनसे आच्छादित ज्ञान रहा ये विविध रूप करते धारण ।
पर धूम्र काम का हटता है, ज्ञानाग्नि तीव्र जब हो जाती,
.साधक पर तब इस बैरी की, कोई न चाल चलने पाती ।
श्लोक (४१,४२,४३)
जो भी उपाय हम करते हैं उनका ही लाभ बढ़ाते वे,
हो जाते हठयोगी परास्त उन पर अधिकार जमाते वे
पर यह न सोचना काम क्रोध ये हैं अजेय बलशाली हैं,
यदि सुधा सिन्धु इनका सोखें, तो ये निर्बल हैं खाली हैं।
है वास इन्द्रियों में इनका, हैं अमरबेल से छाये ये,
जीवन पाकर उनसे उन पर, अपना अधिकार जमाये ये ।
इन्द्रियाँ कर्म प्रेरित करतीं इसलिए, जीत लो बस उनको,
फिर नहीं मिलेंगे काम क्रोध ये, गड़बड़ कुछ करते तुमको।
ऐसा करने से मन का जो आवेग क्षीण हो जायेगा,
मिट गया बसेरा दुष्टों का, तो ठौर कहाँ मिल पायेगा?
यदि अन्तस में रह नहीं सके तो निश्चित ये मर जायेंगे,
बिन सूर्य किरण के क्या मृगजल हम कहीं देखने पायेंगे?
जब राग-द्वेष का हो अभाव, तो निर्मल ज्ञान हाथ आता,
निज सुख का भोग पुरुष पाता, उसको न काम बहका पाता ।
मन, बुद्धि, इन्द्रियाँ, ये तीनों, हैं ठाँव काम के रहने के,
इन पर अधिकार जमा लेता, वश में न मनुज के रहने से ।
यह घर में घुसे शत्रु जैसा, जीवन-निधि को हथिया लेता,
यह ज्ञान और जीवात्मा को, धीरे धीरे फुसला लेता ।
इसलिए पार्थ पहिले अपनी इन्द्रियाँ करो वश में अपने,
जिनको बहकाये रखे काम, ताने बाने फैला अपने ।
विज्ञान, ज्ञान का बाधक जो हो सजग उसे निर्मूल करो,
जीवित मत छोड़ो पापी को, निश्चय ही उसका हनन करो।
अर्जुन आत्मा का बल प्रधान, इससे ही काम दग्ध होता,
आत्मा जागे तो काम तन्त्र के वश में नहीं मनुज होता ।
इन्द्रियाँ शरीर से सूक्ष्म रहीं, बलवान रहीं, वे श्रेष्ठ रहीं,
मन रहा इन्द्रियों के ऊपर, अरु बुद्धि मनस के परे रही ।
आत्मा है परे बुद्धि के भी, करना होता उसका शोधन,
हो जाता मन्मथ क्षार क्षार, लखकर आत्मा का उन्मीलन ।
जो सूक्ष्म रहा, बलवान रहा, अरु रहा, श्रेष्ठ सब से बढ़कर,
पहिचान बुद्धि से तू उसको, वश में अपने अपना मन कर ।
तू कामरूप दुर्जय बैरी को, मार डाल करके निश्चय,
महाबाहु, इस महाशत्रु पर करना तुमको प्राप्त विजय |
ॐ। इति कर्मयोग नामेंतृतीयो अध्याय:। ॐ