‘गीता ज्ञान प्रभा ‘ धारावाहिक ..35

मध्य प्रदेश के नरसिंगपुर जिले की माटी के मूर्धन्य साहित्यकार स्वर्गीय डॉक्टर रमेश कुमार बुधौलियाजी द्वारा रचित ‘गीता ज्ञानप्रभा’ ग्रंथ एक अमूल्य ,धार्मिक साहित्यिक धरोहर है, जिसमे डॉक्टर साहब द्वारा ज्ञानेश्वरीजी महाराज रचित ज्ञानेश्वरी गीता का भावानुवाद किया है, श्रीमद्भगवतगीता के 700 संस्कृत श्लोकों को गीता ज्ञान प्रभा में 2868 विलक्ष्ण छंदों में समेटा गया है।

उन्ही के द्वारा श्रीमद्भगवतगीता महाकाव्य की छंदोंमयी श्रंखला ‘गीता ज्ञान प्रभा ‘ धारावाहिक की 35 वी कड़ी ..

तृतीयोऽध्यायः- ‘कर्म योग’

             ‘कर्म योग या कार्य की पध्दति’

श्लोक (७)

पर पुरुष इन्द्रियों को अपनी, जो अपने वश में कर लेता,

अरु अनासक्त रहकर उनसे, जो कर्मयोग धारण करता ।

जो कर्म इन्द्रियों के सारे आचार सहित सम्पन्न करे,

है श्रेष्ठ पुरुष, जो कर्म करे, पर कर्मभाव से नहीं बँधे

 

हे अर्जुन तुम्हें बताता हूँ, हैं मुक्त मनुज के लक्षण क्या?

जो मुक्त मनुज, परमात्मा में, उसका मन निश्चल लीन रहा ।

साधारण लोगों जैसा ही, वह अपना लोकाचार करे,

पर नहीं इन्द्रियों के विषयों में, अपना तनिक लगाव रखे।

 

विषयों से डरता नहीं, कर्म करणीय-चूकता नहीं कभी,

जो करें इन्द्रियाँ कर्म करें, पर वह उनके आधीन नहीं ।

आकर्षित नहीं वासना से, मन की न मोह बाधा बनता,

ज्यों कमल पत्र जल में रहता, पर जल न उसे गीला करता ।

 

लौकिक व्यवहारों को करके भी, लिप्त नहीं उनसे होता,

वह रहा असाधारण भीतर, पर बाहर साधारण दिखता ।

पानी की संगति से सूरज का, ज्यों प्रतिविम्ब उभरता है,

साधक मन त्यो परमात्म तत्त्व का, नित आलम्बन करता है ।

 

ऐसे गुण से जो युक्त रहा, विषयों में रुचि न रही जिसकी,

वह योगी है, वह मुक्त रहा, सार्थक हो गई साध उसकी ।

वह पात्र प्रशंसा का जग में, तुम भी उसका अनुकरण करो,

रख प्रभु में अटल बुद्धि, अर्जुन तुम भी अपने सब काम करो।

 

इसलिये कि अर्जुन पुरुष श्रेष्ठ, मन-इन्द्रिय को वश में रखता,

निष्काम भाव से कर्म करे, आदर्श दूसरों को बनता ।

श्लोक (८)

निश्चित कर्तव्य तुम्हारा मैं, तुमको बतलाता हूँ अर्जुन,

जो शास्त्र विहित कर्तव्य कर्म, तू कर चल उनका सम्पादन ।

हे अर्जुन कर्म न करने से, है श्रेष्ठ कर्म अपने करना,

क्या कर्म किए बिन सम्भव है, तेरे शरीर का सध सकना?

 

पालन स्वधर्म का कर अर्जुन, है युद्ध स्वधर्म आज तेरा,

हिंसात्मक क्रूर भले दीखे, लेकिन कर्तव्य बना तेरा ।

निष्काम भाव से करो इसे, इसमें ही निहित भलाई है,

सारे संशय का त्याग करो, यह घड़ी युद्ध की आई है ।

 

इसलिए कि कर्म न करने से, होता है श्रेष्ठ कर्म करना,

बिन कर्म किए निर्वाह देह का, सम्भव रहा न हो सकना ।

श्लोक (९)

होता है अन्तःकरण शुद्ध, जो यज्ञ कर्म अपने करता,

निष्काम भाव से किया कर्म, बन्धन का हेतु नहीं बनता ।

पर यज्ञ-कर्म को छोड़, दूसरे कर्मों में आसक्ति रखे,

जन-मानस ऐसा नहीं, कर्म के बन्धन से, अर्जुन, उबरे ।

 

आसक्ति रहित तू, यज्ञ-कर्म करने उद्यत हो जा अर्जुन,

कर्तव्य कर्म कर भली भाँति तू, सुस्थिर कर ले अपना मन ।

जो धर्माचरण रहा, वह ही है, नित्य-यज्ञ ऐसा समझो,

चूका स्वधर्म से जो, मनुष्य उसका बस अध: पतन समझो।

श्लोक (१०)

ब्रह्मा ने आदि कल्प में, जब संसार रचा तो यज्ञ रचा,

अरु साथ यज्ञ के प्रजाजनों के, साथ विपुल संसार रचा।

फिर बोले देव प्रजाओं से, तुम लोग यज्ञ से वृद्धि करो,

होंगी पूरी सब इच्छायें, तुम होम करो, तुम यजन करो ।

 

अर्जुन यह रहा मनुष्यों को, ब्रह्माजी का आशीर्वाद,

यह यज्ञ स्वधर्म रूप उनका, हर लेगा उनके सब विषाद ।

कर पालन सांगोपांग, सदा उन्नति पाते जायेंगे वे,

सुधरेगी दिन दिन दशा, पतन की ओर न बढ़ पायेंगे वे ।

 

इसलिए कि मिलती मुक्ति नहीं, जो यज्ञ-कर्म को करे नहीं,

श्रेयस पाते हैं याज्ञिक जन, ब्रह्माजी का है कथन यही। क्रमशः…