रचित ‘गीताज्ञानप्रभा’ ग्रंथ एक अमूल्य ,धार्मिक साहित्यिक धरोहर है, जिसमे डॉक्टर साहब द्वारा ज्ञानेश्वरीजी महाराज रचित ज्ञानेश्वरी गीता का भावानुवाद किया है, श्रीमद्भगवतगीता के 700 संस्कृत श्लोकों को गीता ज्ञान प्रभा में 2868 विलक्ष्ण छंदों में समेटा गया है।सप्तदशोऽध्यायः – ‘श्रद्धात्रय विभाग योग’ अध्याय सत्रह – ‘श्रद्धा तत्व पर लागू किये गए तीनो गुण’
श्लोक (२२,२३)
जो दान निषिद्ध दिया जावे, अथवा अयोग्य जिसको पाता,
या पात्र दान का नहीं रहा, वह जिसको दान दिया जाता ।
अथवा सुपात्र को दान मगर, वह तिरस्कार के सहित रहा,
वह दान तामसी है अर्जुन, जिसमें दाता का गर्व भरा ।
जो गलत जगह पर, गलत समय जो गलत द्रव्य बांटा जाए,
या साथ निरादर के दाता, द्वारा जो दान दिया जाये ।
वह दान तामसी रहा पार्थ, वह दाता का ही करे पतन,
वह दान, दान के योग्य नहीं, यदि दूषित धन यदि दूषित मन ।
तप दान यज्ञ तीनों का यह, मैंने विभाग जो बतलाया,
राजस तामस को छोड़ पार्थ, जाए बस सत को अपनाया ।
सात्विक जो यज्ञ, दान, तप हैं, सर्वोच्च शिखर पर पहुंचाते,
साधक को आत्म ज्ञान होता, साधक परमात्मा को पाते।
हो यज्ञ, दान या तप इनका, सात्विक व्यवहार उचित होता,
‘ॐ तत सत’ ब्रह्म तत्व वाचक, यह मन्त्र सभी दूषण धोता।
अक्षर ये तीन अनादि रहे, वह रहा सृष्टि का आदिकाल,
ब्राम्हण अरु वेद यज्ञ प्रगटे, ‘ॐ तत सत ‘की महिमा अपार ।
‘ओम’परम तत्व का सूचक है, ‘तत’ सूचक सार्वभौमिकता का,
‘सत’ पार ब्रह्म का सूचक है, दर्शाता उसकी वास्तविकता ।
अस्तित्वमान”सत’ कहलाता, ‘तत’ रहा परे उसके अतीत,
ब्रहाण्ड निकाया ब्रह्मा वही, वह जग में रह जग से अतीत ।
दर्शाये दशा चेतना की, जाग्रत अरु स्वप्न, सुषुप्ति तीन,
चौथी जो लोकातीत रही, उसको दर्शाती जो तुरीय ।
यह है प्रतीक उस सत्ता का, जो सृष्टि सृजे पाले उसको,
जो रहे सृष्टि के कण कण में, जड़ चेतन जग, धारे उसको ।
जो सत चेतन-आनंद ब्राह्म उससे उत्पत्ति प्रजापति की,
जिनसे ब्राह्मण, अरु वेद हुए, अरु यज्ञों की अभिवृद्धि हुई।
जग-जीवन के सारे कर्त्ता, अरु कर्म सभी, उनके विधान,
साधित सब रहे मन्त्र से ही, यह मन्त्र रहा सबसे प्रधान ।
परमात्मा के ये नाम तीन, ओम, तत, सत, वेदों में प्रधान,
इनका महत्व सर्वाधिक है जब साधा जाए अनुष्ठान ।
केवल इसके उच्चारण से, सारे अंगों के दोष मिटें,
हो सिद्ध कार्य हर साधक का, जप मन्त्र सिद्धि निर्विघ्न वरें। क्रमशः….