रचित ‘गीताज्ञानप्रभा’ ग्रंथ एक अमूल्य ,धार्मिक साहित्यिक धरोहर है, जिसमे डॉक्टर साहब द्वारा ज्ञानेश्वरीजी महाराज रचित ज्ञानेश्वरी गीता का भावानुवाद किया है, श्रीमद्भगवतगीता के 700 संस्कृत श्लोकों को गीता ज्ञान प्रभा में 2868 विलक्ष्ण छंदों में समेटा गया है।सप्तदशोऽध्यायः – ‘श्रद्धात्रय विभाग योग’ अध्याय सत्रह – ‘श्रद्धा तत्व पर लागू किये गए तीनो गुण’
श्लोक (५,६)
जो वेद विरुद्ध मनोकल्पित, तप के नूतन विधान रचते,
उनका स्वभाव आसुरी रहा, वे हितकर कार्य नहीं करते ।
वे दम्भ, दर्प से भरे मनुज, करते हैं वास रजोगुण में,
आसक्ति कामना लिए हुए, वे भ्रमित रहे अपने बल में ।
वे अहंकार के वशीभूत, तप से अपना तन सुखा चले,
अविवेकी वे इस भाँति मुझे, पहुँचाते कष्ट न यह समझे ।
मुझ अन्तर्यामी प्रभु को जो, दुख देने वाले असुर रहे,
वे शास्त्रों के विपरीत चले, वे नहीं बन्धनों से उबरे ।
कल्पित तप में जो तपते हैं, पालन न करें जो विधि-विधान,
श्रद्धा विहीन वे पाखण्डी, दें कष्ट देह को जो सकाम ।
वे अभिमानी, वे अज्ञानी, मुझको पीड़ा पहुंचाते हैं,
वे अश्रद्धालु आसुरी स्वभाव, मुझको न देखने पाते हैं ।
वे लोग प्रदर्शन प्रिय रागी, बल प्रेरित अहम् कामना से,
बहुभाँति कष्ट देते तन को, शास्त्रों का अनदेखा करके ।
दे रहे कष्ट तन-तत्वों, को, पीड़ा मुझ अन्तर्यामी को,
संकल्प आसुरी उनके सब, अर्जुन तुम उन्हें असुर जानो ।
निन्दित वे सब पद्धतियाँ हैं, तन के तप का जो ढोंग करे,
काँटों पर सोयें, तन छेदें, या आग तपें, अंगार झलें ।
रख जटा-जूट विकराल बनें, या वेष करें भीषण धारण,
अशुचिता तामस की गठरी, शुचिता में सारा अनुशासन । क्रमशः….