रस्मों की बेड़ियाँ बनाम रूहानी प्रेम; जब ‘अंजली’ और ‘मोहिनी’ ने समाज की परवाह किए बिना थामे एक-दूसरे के हाथ
यह खबर केवल दो युवतियों के विवाह की नहीं, बल्कि रूढ़ियों के पिंजरे और प्रेम की उड़ान के बीच के उस संघर्ष की है, जो आज के सभ्य समाज के सामने कई गंभीर सवाल खड़े करता है।
त्वरित टिप्पणी : राकेश प्रजापति
प्रेम न सीमाएं जानता है, न जेंडर। मध्य प्रदेश के छतरपुर जिले से प्रेम की एक ऐसी ही साहसी लेकिन संघर्षपूर्ण दास्तां सामने आई है, जिसने ‘सभ्य समाज’ के दावों और ‘पारिवारिक मान-मर्यादा’ की बंदिशों को झकझोर कर रख दिया है। यह कहानी है 23 वर्षीय अंजली रैकवार और 21 वर्षीय मोहिनी कुशवाहा की, जिन्होंने दुनिया की परवाह किए बिना एक-दूसरे के साथ जीवन बिताने का फैसला किया है।
पाँच साल का मौन प्रेम और बागेश्वर धाम की साक्षी
अंजली और मोहिनी का प्रेम कोई क्षणिक आकर्षण नहीं, बल्कि पाँच सालों का वह गहरा अहसास है जिसे उन्होंने दुनिया की नजरों से बचाकर सींचा था। जब समाज और परिवार की बंदिशें उनके अरमानों के आड़े आने लगीं, तो उन्होंने आस्था के सबसे बड़े केंद्र छतरपुर बागेश्वर धाम को अपनी गवाही के लिए चुना। 12 जनवरी को, जब पूरी दुनिया कड़ाके की ठंड से ठिठुर रही थी, इन दो दिलों ने एक-दूसरे को हमसफर चुनकर जीवन की नई गर्माहट खोजी।
थाने की दहलीज पर छिड़ा ‘अपनत्व’ और ‘अधिकार’ का युद्ध
शादी के बाद जब यह जोड़ा सिविल लाइन थाने पहुँचा, तो नजारा भावुक भी था और तनावपूर्ण भी। एक तरफ वह प्रेम था जिसे कानून की ढाल की तलाश थी, तो दूसरी तरफ मोहिनी का परिवार था, जिसकी नजर में यह ‘मर्यादाओं का उल्लंघन’ था।
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हंगामे की गूँज: परिजनों ने मोहिनी को जबरन घर ले जाने की कोशिश की। थाने के भीतर चीख-पुकार और तीखी बहस के बीच उन युवतियों की आँखों में सिर्फ एक-दूसरे के लिए सुरक्षा की गुहार थी।
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पुलिस की भूमिका: पुलिस ने संवेदनशीलता दिखाते हुए दोनों युवतियों को सुरक्षा घेरे में लिया। यह एक ऐसी स्थिति थी जहाँ खाकी को केवल कानून ही नहीं, बल्कि इंसानी भावनाओं को भी संभालना था।
कानूनी पेचीदगी और सामाजिक द्वंद्व
यह मामला हमारे समय के सबसे बड़े विमर्श को जन्म देता है।
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व्यक्तिगत स्वतंत्रता: सुप्रीम कोर्ट द्वारा धारा 377 को निष्प्रभावी करने के बाद, दो वयस्कों का आपसी सहमति से साथ रहना (Live-in) अपराध नहीं है।
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विवाह की मान्यता: हालांकि, भारत में समलैंगिक विवाह को अभी तक पूर्ण कानूनी और वैधानिक मान्यता प्राप्त नहीं हुई है, जिसके कारण ऐसे जोड़ों को सामाजिक सुरक्षा मिलने में कानूनी अड़चनें आती हैं।
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सभ्य समाज की बंदिशें: हमारा समाज आज भी प्रेम को जेंडर के तराजू पर तौलता है। परिवार के लिए यह ‘लोकलाज’ का विषय बन जाता है, जबकि प्रेम करने वालों के लिए यह अस्तित्व की लड़ाई होती है।
मानवीय दृष्टिकोण: क्या हम तैयार हैं ?
अंजली और मोहिनी का मामला केवल एक पुलिस डायरी की एंट्री नहीं है। यह एक आईना है उस समाज के लिए, जो अक्सर ‘संस्कारों’ के नाम पर व्यक्तिगत खुशी का गला घोंट देता है। अंजलि का यह कहना कि “हमने साथ जीने-मरने की कसमें खाई हैं”, उस अटूट विश्वास को दर्शाता है जो किसी भी कागजी दस्तावेज से बड़ा है।
फिलहाल, पुलिस कानूनी परामर्श ले रही है, लेकिन सवाल वही बरकरार है— क्या हमारा समाज कानून से आगे बढ़कर उन भावनाओं को स्वीकार कर पाएगा, जो पारंपरिक सांचों में फिट नहीं बैठतीं ?