सियासत के जहर पर भारी पड़ा इंसानियत का अमृत: छिंदवाड़ा में मुस्लिम युवाओं ने पेश की ‘गंगा-जमुनी तहजीब’ की अद्भुत मिसाल
मौजूदा दौर में जहां राजनीति और चंद राजनेताओं के बयानों ने महज वोट बैंक की खातिर समाज में विष वमन करने का काम किया है, वहां अक्सर हमारी सदियों पुरानी ‘गंगा-जमुनी तहजीब’ खतरे में नजर आती है। राजनीतिक स्वार्थ के लिए बोए गए इस नफरत के जहर के दुखद दुष्परिणाम भी हमें यदा-कदा समाज में देखने को मिलते हैं। लेकिन, भारतवर्ष की इस साझी विरासत और आपसी भाईचारे की जड़ें इतनी गहरी हैं कि सियासत की कोई भी आंधी इन्हें कभी नहीं मिटा सकती। इसी सामाजिक सद्भाव और समरसता की एक अत्यंत मार्मिक और सुकून देने वाली बानगी बुधवार को मध्य प्रदेश के छिंदवाड़ा में देखने को मिली, जिसने यह साबित कर दिया कि नफरत की तमाम कोशिशों के बावजूद इंसानियत आज भी हमारे दिलों में जिंदा है।
✍️ राकेश प्रजापति
जब स्वर्ग रथ के लिए खामोश हो गया जश्न का शोर
बुधवार को छिंदवाड़ा शहर में ईद-मिलादुन्नबी का पावन पर्व हर्षोल्लास के साथ मनाया जा रहा था। शहर की सड़कों पर मुस्लिम समाज का विशाल जुलूस अपनी पूरी रौनक और डीजे की गूंज के साथ निकल रहा था। जब यह जुलूस बैल बाजार चौक से गुजर रहा था, तभी मोहन नगर की ओर से एक अंतिम यात्रा (स्वर्ग रथ) वहां आ पहुंची और भारी भीड़ के बीच अटक गई।
जैसे ही जुलूस में शामिल मुस्लिम समाज के युवाओं की नजर उस स्वर्ग रथ पर पड़ी, इंसानियत अपने सर्वोच्च शिखर पर जा पहुंची। युवाओं ने बिना एक पल गंवाए, स्वतः संज्ञान लेते हुए जुलूस के सारे डीजे तुरंत बंद करवा दिए। जश्न का शोर चंद पलों में एक आदरपूर्ण शांति में बदल गया। हजारों की भीड़ ने सम्मान के साथ दो हिस्सों में बंटकर उस अंतिम यात्रा के काफिले को निकालने के लिए रास्ता खाली कर दिया। जब तक अंतिम यात्रा पूरी तरह से वहां से गुजर नहीं गई, तब तक जुलूस वहीं शांति से खड़ा रहा और उसके बाद ही आगे बढ़ा।
“मानव के प्रति मानव का प्रेम, किसी जाति, मजहब या भौगोलिक भूभाग पर खींची गई लकीरों का मोहताज नहीं होता।”
छिंदवाड़ा की सड़कों पर घटा यह दृश्य सिर्फ एक खबर नहीं है, बल्कि समाज के मुंह पर फेंका गया वह सच है जो बताता है कि आम हिंदुस्तानी आज भी एक-दूसरे के सुख-दुख में कंधे से कंधा मिलाकर खड़ा है।
ऐसी घटनाएं हमें याद दिलाती हैं कि जब-जब नफरत की आंधियां समाज को बांटने की कोशिश करेंगी, तब-तब ऐसे वाकये ‘मानवता’ के सूखते अंकुरों को नई उम्मीद की हवा, खाद और पानी देंगे। छिंदवाड़ा के इन युवाओं ने अपने आचरण से नफरत के रेगिस्तान में जो बीज बोया है, वह आने वाली पीढ़ियों के लिए ‘मानवता की लहलहाती फसल’ बनकर यह पैगाम देगा कि मजहब नहीं सिखाता आपस में बैर रखना।