मध्यभारत में गिद्ध संरक्षण का नया सवेरा, पारिस्थितिकी तंत्र के ‘सफाईकर्मियों’ की लौटी रौनक
औद्योगीकरण और मानवीय हस्तक्षेप के कारण जहां देश के कई हिस्सों से आसमान के पहरेदार कहे जाने वाले गिद्ध (वल्चर) तेजी से विलुप्त हो रहे हैं, वहीं मध्यप्रदेश का छिंदवाड़ा जिला वन्यजीव संरक्षण के वैश्विक मानचित्र पर एक नई उम्मीद बनकर उभरा है। हाल ही में संपन्न हुए ग्रीष्मकालीन गिद्ध सर्वेक्षण के परिणाम न केवल उत्साहजनक हैं, बल्कि यह साबित करते हैं कि यदि प्रशासनिक इच्छाशक्ति और जनभागीदारी का सही तालमेल हो, तो प्रकृति अपने पुराने स्वरूप में लौट सकती है। छिंदवाड़ा वनवृत्त से आए ये ताजा आंकड़े देश के पर्यावरणविदों और वन्यजीव प्रेमियों के लिए एक बड़ी राहत लेकर आए हैं।
राकेश प्रजापति
ग्रीष्मकालीन सर्वे: आंकड़ों में उम्मीद की उड़ान
22 से 24 मई के बीच छिंदवाड़ा वनवृत्त में आयोजित त्रि-दिवसीय ग्रीष्मकालीन गिद्ध सर्वेक्षण के प्रारंभिक आंकड़े बेहद सकारात्मक संकेत दे रहे हैं। इस गणना के दौरान जिले के दोनों वनमंडलों में कुल 148 गिद्धों की जीवंत उपस्थिति दर्ज की गई है।
वन विभाग द्वारा जारी आंकड़ों का वैज्ञानिक विश्लेषण करें तो नई पीढ़ी की मौजूदगी ने विशेषज्ञों को सबसे ज्यादा उत्साहित किया है:
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पूर्व वनमंडल: यहां कुल 90 गिद्ध पाए गए, जिनमें से 80 वयस्क (Adult) और 10 अवयस्क (Juvenile) हैं।
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पश्चिम वनमंडल: इस क्षेत्र में कुल 58 गिद्ध दर्ज किए गए, जिनमें 53 वयस्क और 5 अवयस्क शामिल हैं।
अवयस्क गिद्धों (तेंदुओं/शावकों की तरह प्रकृति की निरंतरता के सूचक) की यह संख्या दर्शाती है कि छिंदवाड़ा के जंगलों में गिद्धों के अनुकूल प्रजनन वातावरण तैयार हो चुका है। इससे पहले वर्ष 2025 में यह संख्या महज 116 थी, जो फरवरी 2026 की गणना में बढ़कर 155 तक पहुंच गई थी। मौसमी बदलावों के बावजूद ग्रीष्मकाल में 148 गिद्धों का यहां टिके रहना यह प्रमाणित करता है कि यह क्षेत्र अब उनका स्थायी और सुरक्षित आशियाना बन चुका है।
जैव-विविधता का अनूठा ठिकाना: चट्टानें और ऊंचे दरख्त
गिद्धों की प्रजातियों के मामले में छिंदवाड़ा वनवृत्त अद्भुत विविधता समेटे हुए है। सर्वेक्षण के दौरान जिले के अलग-अलग क्षेत्रों में गिद्धों की दुर्लभ प्रजातियां अपने प्राकृतिक आवास में अठखेलियां करती दिखीं:
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पूर्व हर्रई क्षेत्र: यहाँ मुख्य रूप से इंडियन वल्चर, लॉन्ग-बिल्ड वल्चर (लम्बी चोंच वाले गिद्ध) और देशी गिद्धों का बसेरा देखा गया।
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पश्चिम हर्रई: इस इलाके में अत्यंत संवेदनशील माने जाने वाले ‘सफेद या इजिप्शियन गिद्ध’ (Egyptian Vulture) की मौजूदगी दर्ज की गई।
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पूर्व व पश्चिम बटकाखापा: इन क्षेत्रों में क्रमशः इंडियन लॉन्ग-बिल्ड और गंभीर रूप से संकटग्रस्त प्रजाति ‘व्हाइट-बैक्ड वल्चर’ (सफेद पीठ वाले गिद्ध) पाए गए।
पर्यावरणविदों के अनुसार, छिंदवाड़ा के ऊंचे और दुर्गम चट्टानी इलाके तथा सतपुड़ा के घने, ऊंचे वृक्ष इन पक्षियों को शिकारियों से सुरक्षा और घोंसले बनाने के लिए आदर्श भौगोलिक स्थिति प्रदान करते हैं।
संरक्षण के पीछे ‘त्रिशक्ति’: प्रशासन, विशेषज्ञ और समाज
छिंदवाड़ा मॉडल की सफलता का सबसे बड़ा कारण वन विभाग, स्थानीय विशेषज्ञों और सामाजिक संस्थाओं का त्रिकोणीय समन्वय है। पूर्व वनमंडल अधिकारी साहिल गर्ग ने इस सफलता पर प्रसन्नता व्यक्त करते हुए कहा:
“छिंदवाड़ा वनवृत्त में गिद्धों की बढ़ती आबादी हमारे निरंतर प्रयासों का प्रतिफल है। वन विभाग द्वारा की जा रही वैज्ञानिक निगरानी, सुरक्षित आवासों का संरक्षण और स्थानीय समुदायों के बीच संवेदीकरण के कारण यह सकारात्मक बदलाव संभव हुआ है। गिद्ध हमारे पारिस्थितिकी तंत्र की रीढ़ हैं, जो मृत मवेशियों का निस्तारण कर महामारी फैलने से रोकते हैं। इनके संरक्षण के लिए समाज के हर वर्ग को आगे आना होगा।”
इस अभियान को धरातल पर उतारने में वल्चर कमेटी के सदस्य दिलशेर खान ने फ्रंटलाइन वॉरियर की भूमिका निभाई है। उन्होंने वन अमले के साथ मिलकर गिद्धों के संवेदनशील ठिकानों की चौबीसों घंटे निगरानी सुनिश्चित की। वहीं दूसरी ओर, जमीनी स्तर पर जनचेतना जगाने का जिम्मा सतपुड़ा साइंस एजुकेशन एंड वेलफेयर सोसायटी ने संभाला है। इस टीम ने ग्रामीण और आदिवासी अंचलों में लगातार नुक्कड़ सभाएं और जागरूकता अभियान चलाकर ग्रामीणों को समझाया कि गिद्ध डरावने पक्षी नहीं, बल्कि प्रकृति के अनमोल सफाईकर्मी हैं।
भविष्य की राह: राष्ट्रीय मॉडल बनने की ओर छिंदवाड़ा
विगत एक वर्ष में छिंदवाड़ा वनवृत्त में गिद्धों की संख्या में दर्ज की गई लगभग 39 अंकों की शुद्ध वृद्धि यह संकेत देती है कि यह जिला जल्द ही मध्यभारत में गिद्ध संरक्षण का एक ‘राष्ट्रीय मॉडल’ बन सकता है। देश के अन्य हिस्सों में जहां डाइक्लोफेनाक जैसी दवाओं के दुष्प्रभाव और भोजन की कमी से गिद्धों का नामोनिशान मिट रहा है, वहीं छिंदवाड़ा ने उन्हें एक सुरक्षित कॉरिडोर दिया है।
जिला प्रशासन और वन विभाग के उप वनसंरक्षक अनादि बुधौलिया ने आम नागरिकों और पर्यटकों से पुरजोर अपील की है कि वे गिद्धों के प्राकृतिक आवासों, विशेषकर चट्टानी चोटियों और ऊंचे पेड़ों के आसपास अनावश्यक हस्तक्षेप, शोर-शराबा या मानवीय गतिविधियां न करें। यदि हम इन मूक संरक्षकों को थोड़ा सा एकांत और सुरक्षा दे सकें, तो आसमान में मंडराते इन विशाल डैनों की गड़गड़ाहट हमारी धरती को बीमारियों से मुक्त रखने की गारंटी बनी रहेगी।