मप्र सियासत का नया अध्याय: मोहन कैबिनेट में ‘सर्जरी’ की तैयारी और नियुक्तियों का महामंथन
मध्य प्रदेश की सियासत में इस समय ‘बदलाव की बयार’ और ‘असंतोष की चिंगारी’ एक साथ देखने को मिल रही है। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के मंत्रिमंडल में संभावित सर्जरी की आहट ने जहाँ सत्ता के गलियारों में हलचल मचा दी है, वहीं निगम-मंडलों में ‘अपनों’ को छोड़ ‘गैरों’ पर हो रही मेहरबानी ने भाजपा के मूल कार्यकर्ताओं की बेचैनी बढ़ा दी है। ढाई साल का कार्यकाल पूरा होने से पहले मंत्रियों के रिपोर्ट कार्ड तैयार हो चुके हैं, जिसमें खराब प्रदर्शन करने वाले चेहरों की विदाई और दिग्गजों की वापसी के संकेत मिल रहे हैं। चुनावी बिसात पर बिछाई जा रही इस नई ‘सोशल इंजीनियरिंग’ में क्या भाजपा अपने पुराने वफादारों को मना पाएगी या ‘कांग्रेस से आए सैलाब’ को पद बांटने की मजबूरी पार्टी पर भारी पड़ेगी ?
राकेश प्रजापति
मध्य प्रदेश की राजनीति इस समय एक निर्णायक मोड़ पर खड़ी है। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के नेतृत्व वाली सरकार अब अपने कार्यकाल के उस पड़ाव पर पहुँच रही है, जहाँ वह केवल प्रशासनिक कसावट ही नहीं, बल्कि एक गहरी राजनैतिक शल्य चिकित्सा (सर्जरी) की तैयारी में है। राजधानी भोपाल के गलियारों से लेकर दिल्ली के सत्ता केंद्रों तक, ‘मोहन कैबिनेट’ के विस्तार और फेरबदल की आहटें अब साफ सुनाई देने लगी हैं। यह केवल चार खाली पदों को भरने की कवायद नहीं है, बल्कि आगामी चुनावों को ध्यान में रखकर बिछाई जा रही एक सोची-समझी बिसात है।
मंत्रिमंडल विस्तार: परफॉर्मेंस बनाम अनुभव
मध्य प्रदेश सरकार अगले महीने अपने ढाई साल का महत्वपूर्ण सफर पूरा करने जा रही है। इस मील के पत्थर से पहले, सत्ता और संगठन ने मंत्रियों की कार्यशैली का सूक्ष्म अध्ययन किया है। सूत्रों के अनुसार, करीब आधा दर्जन मंत्रियों की ‘रिपोर्ट कार्ड’ उत्साहजनक नहीं पाई गई है। ऐसे में, केवल नए चेहरों को शामिल करना ही लक्ष्य नहीं है, बल्कि खराब प्रदर्शन करने वाले मंत्रियों की विदाई भी लगभग तय मानी जा रही है।
संवैधानिक मर्यादा के अनुसार, प्रदेश में अधिकतम 35 मंत्री हो सकते हैं, जबकि वर्तमान में यह संख्या 31 है। रिक्त पड़े इन चार पदों के अलावा, फेरबदल के माध्यम से करीब छह नए चेहरों को कैबिनेट में जगह मिलने की संभावना है। चर्चाओं के केंद्र में बुंदेलखंड के कद्दावर नेता गोपाल भार्गव और भूपेंद्र सिंह जैसे दिग्गजों की वापसी भी है, जिन्हें पिछली बार मंत्रिमंडल में स्थान नहीं मिल सका था।
जातीय और क्षेत्रीय संतुलन की बिसात
भाजपा की रणनीति हमेशा से ही सामाजिक समीकरणों को साधने की रही है। इस बार के विस्तार में मालवा, महाकौशल और बुंदेलखंड क्षेत्रों को प्राथमिकता दी जा सकती है, क्योंकि इन इलाकों का प्रतिनिधित्व वर्तमान मंत्रिमंडल में तुलनात्मक रूप से कम है।
दावेदारों की सूची लंबी है और उत्साह भी चरम पर है। प्रमुख नामों में शामिल हैं:
-
डॉ. राजेंद्र पांडेय (रतलाम): चार बार के विधायक और अनुभवी चेहरा।
-
मालिनी गौड़ और मनोज पटेल (इंदौर): मालवा क्षेत्र में पैठ मजबूत करने के लिए सशक्त दावेदार।
-
अन्य दिग्गज: उषा ठाकुर, अर्चना चिटनीस, रीति पाठक और बृजेंद्र सिंह यादव जैसे नेताओं के नाम भी संभावित सूची में तैर रहे हैं।
निगम-मंडलों में ‘गैरों’ पर मेहरबानी और पनपता असंतोष
जहाँ एक ओर मंत्रिमंडल विस्तार की चर्चा है, वहीं दूसरी ओर निगम-मंडलों और प्राधिकरणों में हो रही धड़ाधड़ नियुक्तियों ने पार्टी के भीतर एक नई बहस छेड़ दी है। हालिया नियुक्तियों के आकलन से यह तथ्य उभरकर सामने आया है कि पार्टी के ‘मूल कार्यकर्ता’ अभी भी कतार में खड़े हैं, जबकि कांग्रेस से आए नेताओं (जिन्हें ‘गैर’ या बागी कहा जा रहा है) पर पद और प्रतिष्ठा की जमकर बौछार हो रही है।
विशेष रूप से उन नामों पर सवाल उठ रहे हैं जो पूर्व में पार्टी विरोधी गतिविधियों के कारण निष्कासित रहे हैं:
-
केशव सिंह बघेल: जिन्हें कांग्रेस ने 2022 में निष्कासित किया था, उन्हें अब राज्य पशुधन एवं कुक्कुट विकास निगम का अध्यक्ष बनाया गया है।
-
महेश केवट: जिन्हें भाजपा ने ही 2022 में 6 साल के लिए निकाला था, उन्हें निष्कासन अवधि पूरी होने से पहले ही राज्य मछुआ कल्याण बोर्ड की कमान सौंप दी गई है।
-
सिंधिया समर्थक: ग्वालियर क्षेत्र में अशोक शर्मा और सुधीर गुप्ता जैसे सिंधिया खेमे के नेताओं को ‘साडा’ और ‘जीडीए’ में महत्वपूर्ण स्थान देकर उपकृत किया गया है।
समन्वय और भावी रणनीति
हाल ही में मुख्यमंत्री निवास पर हुई समन्वय समिति की बैठक, जिसमें राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के वरिष्ठ पदाधिकारी भी शामिल थे, इस बात का प्रमाण है कि हर कदम फूंक-फूंक कर रखा जा रहा है। भाजपा प्रवक्ता डॉ. हितेष वाजपेयी भले ही इसे कार्यकर्ताओं के संघर्ष का सम्मान कहें, लेकिन भीतर ही भीतर पनप रहे असंतोष को थामने के लिए अब जिला स्तर पर भी सत्ता की भागीदारी वाली समितियां बनाने की तैयारी है।
मध्य प्रदेश की मोहन यादव सरकार का यह आगामी विस्तार और नियुक्तियों का दौर केवल प्रशासनिक फेरबदल नहीं, बल्कि 2028 के चुनावी महासमर की तैयारी है। पुराने दिग्गजों के अनुभव और नए चेहरों के उत्साह के बीच संतुलन बिठाना मुख्यमंत्री और संगठन के लिए किसी बड़ी चुनौती से कम नहीं होगा।