नवरात्रि विशेषांक: प्रकृति की गोद में जाग्रत ‘हिंगलाज शक्तिपीठ’
”राकेश प्रजापति ”
जहाँ होता है आदिस्वरूपा से सीधा साक्षात्कार
छिंदवाड़ा के परासिया स्थित गुड़ी-अंबाड़ा के सघन प्राकृतिक सान्निध्य में जब कदम पड़ते हैं, तो एक अलौकिक ऊर्जा का अहसास रोम-रोम को स्पंदित कर देता है। यह केवल ईंट-पत्थर का देवालय नहीं, बल्कि आदिशक्ति मां हिंगलाज का वह जाग्रत दरबार है, जहाँ असीम शांति और परम तत्व से भक्त का सीधा साक्षात्कार होता है। भारतभूमि के चुनिंदा और अत्यंत दुर्लभ हिंगलाज शक्तिपीठों में शुमार यह धाम सिद्धियों और अगाध आस्था का वह महातीर्थ है, जहाँ मौन प्रार्थनाएं भी ब्रह्मांड को चीरकर मां के चरणों तक पहुंचती हैं।
प्रकृति और दिव्यता का महासंगम छिंदवाड़ा नगर से दक्षिण की ओर लगभग 40 किलोमीटर दूर स्थित यह पावन धाम कोलाहल से दूर एकांत की साधना स्थली सा प्रतीत होता है। यहाँ की हवाओं में बहती दिव्यता मन के हर संताप को हर लेती है। यूँ तो यहाँ प्रतिदिन मां की कृपा बरसती है, किंतु मंगलवार और शनिवार को यहाँ का वातावरण एक विशेष आध्यात्मिक चुंबकत्व से भर उठता है, जो दूर-देशांतर से श्रद्धालुओं को अपनी ओर खींच लाता है।
पावन जलकुंड: देह से आत्मा तक की शुद्धि मंदिर के सिंहद्वार पर स्थित अविरल बहता जलकुंड मात्र एक भौतिक जलस्रोत नहीं, बल्कि आत्मिक शुद्धि का जीवंत प्रतीक है। मां के दर्शनों से पूर्व जब भक्त इस निर्मल जल से अपने चरण पखारते हैं, तो मानों वे अपने लौकिक विकारों और अहम् को वहीं त्यागकर एक शुद्ध, निर्मल चेतना के साथ गर्भगृह में प्रवेश करते हैं। यह सदियों से चली आ रही वह सात्विक परंपरा है, जो देह के साथ-साथ आत्मा को भी प्रक्षालित कर देती है।
अखंड ज्योतियों का प्रकाश: अज्ञान के तिमिर का नाश नवरात्रि के सिद्ध मुहूर्त में जब यहाँ हजारों ज्योति कलश एक साथ प्रज्वलित होते हैं, तो वह दृश्य शब्दों की सीमा से परे होता है। दीपों की वह स्वर्णिम आभा केवल मंदिर परिसर को ही नहीं, बल्कि दर्शनार्थियों के अंतर्मन को भी आलोकित कर देती है। झिलमिलाती अखंड ज्योतियों के बीच मां का मुखमंडल एक ऐसी दिव्य छटा बिखेरता है, जिसे देखकर भक्त सुध-बुध खो बैठता है और उसे साक्षात परमसत्ता की अनुभूति होने लगती है।
चमत्कार और शक्ति का प्रमाण: जब नतमस्तक हुआ अहंकार मां की महिमा केवल आस्था तक सीमित नहीं, इसके साक्ष्य इतिहास के पन्नों में भी दर्ज हैं। जनश्रुतियां गवाह हैं कि अंग्रेजी हुकूमत के दौर में जब सत्ता के नशे में चूर एक कोयला खदान संचालक ने मां की प्रतिमा को विस्थापित करने का दुस्साहस किया था, तब प्रकृति ने अपना रौद्र रूप दिखाया। खदान का धंसना उसी आदिशक्ति के कोप और उनकी अखंड उपस्थिति का साक्षात प्रमाण माना जाता है। इस घटना ने यह सिद्ध कर दिया कि मां की सत्ता के आगे हर सांसारिक शक्ति नगण्य है।
राजघरानों की आराध्या हिंगलाज माता का प्रताप केवल स्थानीय नहीं है। राजस्थान के काठियावाड़ राजघराने की कुलदेवी के रूप में पूजित होने के कारण इस सिद्ध पीठ का लौकिक और आध्यात्मिक महात्म्य और भी विराट हो जाता है।
वस्तुतः, गुड़ी-अंबाड़ा का यह हिंगलाज धाम मात्र एक तीर्थ नहीं, बल्कि आत्मा का वह आश्रय स्थल है जहाँ पहुंचने पर जीवन की हर तृष्णा शांत हो जाती है। यह हमारी सनातन मान्यताओं का वह धड़कता हुआ हृदय है, जहाँ भक्त खाली हाथ आता है और मां के असीम वात्सल्य और पूर्णता को हृदय में भरकर लौटता है।
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