4 साल से खुद को ‘जिंदा’ साबित करने की जंग लड़ रहा किसान..

सिस्टम का ‘अंधा’ कानून: जो सांसें ले रहा, उसे कागजों में मार डाला ! 4 साल से खुद को ‘जिंदा’ साबित करने की जंग लड़ रहा किसान ..

कहते हैं मौत का एक दिन मुकर्रर है, लेकिन मध्य प्रदेश के छिंदवाड़ा में सरकारी बाबुओं और बेलगाम ‘सिस्टम’ ने यमराज से भी पहले एक जिंदा इंसान की फाइल निपटा दी! एक किसान पिछले 4 साल से तहसीलों और दफ्तरों की चौखट पर चीख-चीख कर कह रहा है- “साहब ! मैं जिंदा हूं, मेरी सांसें चल रही हैं, मुझे कागजों में तो जिंदा कर दो !” लेकिन फाइलों के बोझ तले दब चुकी बाबूगिरी के कान पर जूं तक नहीं रेंग रही थी।

सरकारी लापरवाही और डिजिटल अंधेरगर्दी का यह सनसनीखेज मामला सीधे तौर पर हमारे प्रशासनिक ढांचे के खोखलेपन को बेनकाब करता है।

126 साल का बताकर छीन ली पहचान मामला चांद तहसील के ग्राम पतलोन का है। किसान ब्रेसना यादव को सरकारी पोर्टल की एक तकनीकी ‘गलती’ ने जीते-जी मार दिया। कमाल देखिए सरकारी तंत्र की ‘स्मार्टनेस’ का ! पोर्टल के रिकॉर्ड में ब्रेसना यादव की जन्मतिथि 1 जनवरी 1900 दर्ज कर दी गई। यानी कंप्यूटर की नजर में किसान महोदय 126 साल के हो गए और इस ‘सुपर-स्मार्ट’ सिस्टम ने अपनी सुविधा के लिए, बिना कोई जमीनी जांच किए, उन्हें ‘स्वर्गीय’ घोषित कर दिया।

छिन गया हक, बाबू बन गए ‘भगवान’ इस कागजी कत्ल का सीधा असर किसान की आजीविका पर पड़ा। 2022 में अचानक उनकी ‘प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि’ रोक दी गई। जब ढाई एकड़ जमीन का यह काश्तकार वजह जानने तहसील पहुंचा, तो पता चला कि सरकार की नजरों में तो वह अब इस दुनिया में है ही नहीं।

  • आधार कार्ड मौजूद है।

  • वोटर आईडी चीख-चीख कर उनके वजूद की गवाही दे रहा है।

  • इंसान खुद सामने खड़ा होकर सांसें ले रहा है। लेकिन कंप्यूटर की स्क्रीन पर आंखें गड़ाए बैठे बाबुओं के लिए वह सिर्फ एक ‘भूत’ है!

बाप की टूटती सांसें और बेटे का संघर्ष चार साल तक तहसील के चक्कर काट-काटकर जब बुजुर्ग ब्रेसना यादव के पैरों ने जवाब दे दिया, तो बेटा जितेंद्र यादव मंगलवार को अकेले ही जनसुनवाई में पहुंचा। उसने सिस्टम के मुंह पर तमाचा जड़ते हुए बताया कि 8 महीने पहले भी इसी कलेक्ट्रेट में गुहार लगाई थी, लेकिन तत्कालीन अफसरों ने एक ‘जिंदा इंसान’ की फरियाद को रद्दी की टोकरी में फेंक दिया था।

नए कलेक्टर की फटकार, क्या अब मिलेगी ‘जिंदगी’? इस मुर्दा हो चुके सिस्टम में थोड़ी हलचल तब मची, जब यह मामला नए कलेक्टर हरेंद्र नारायण के सामने पहुंचा। कागजों में हुए इस ‘डिजिटल मर्डर’ को देख उन्होंने भी माथा पकड़ लिया। कलेक्टर ने तुरंत संबंधित अधिकारियों की जमकर क्लास लगाई और तत्काल प्रभाव से किसान को कागजों में ‘पुनर्जीवित’ करने के निर्देश दिए हैं।

प्रशासनिक तंत्र पर चुभते हुए सवाल:

  • बिना सत्यापन के ‘मौत’ का सर्टिफिकेट: क्या डिजिटल इंडिया का मतलब यही है कि एक टाइपिंग मिस्टेक या कंप्यूटर जनरेटेड ग्लिच किसी जीते-जागते इंसान का वजूद मिटा दे ?

  • अधिकारियों की जवाबदेही कहां है ? जिन अधिकारियों ने 4 साल तक एक किसान को सिर्फ इसलिए प्रताड़ित किया क्योंकि “कंप्यूटर कह रहा है वो मर गया”, क्या उन पर कोई ठोस कार्रवाई होगी?

  • संवेदनहीनता की हद: जब किसान खुद अपने दस्तावेज लेकर खड़ा था, तो 4 साल तक तहसील के कर्मचारियों ने अपनी आंखें क्यों बंद रखीं ?

यह सिर्फ ब्रेसना यादव की कहानी नहीं है; यह उस लालफीताशाही के गाल पर करारा तमाचा है, जहां फाइलें तो दौड़ती हैं, लेकिन आम आदमी की जिंदगी रेंगने को मोहताज है।

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