श्रीकृष्णार्जुन संवाद धारावाहिक की 80 वी कड़ी ..

मध्य प्रदेश के नरसिंगपुर जिले की माटी के मूर्धन्य साहित्यकार स्वर्गीय डॉक्टर रमेश कुमार बुधौलिया जी द्वारा रचित ‘श्रीकृष्णार्जुन संवाद ,धार्मिक साहित्यिक धरोहर है, जिसमे डॉक्टर साहब द्वारा श्रीमद्भगवतगीता  का भावानुवाद किया है ! श्रीमद्भगवतगीता के 700 संस्कृत श्लोकों को ‘श्रीकृष्णार्जुन संवाद में मात्र 697 विलक्ष्ण छंदों में समेटा गया है। गीता के समस्त अठारह अध्यायों का डॉ. बुधौलिया ने गहन अध्ययन करके जो काव्यात्मक प्रदेय हमें सौंपा है, वह अभूतपूर्व है। इतना प्रभावशाली काव्य-रूप बहुत कम देखने को मिलता है। जिनमें सहज-सरल तरीके से गीताजी को समझाने की सार्थक कोशिश की गई है।
इस दिशा में डॉ. बुधौलिया ने स्तुत्य कार्य किया। गीता का छंदमय हिंदी अनुवाद प्रस्तुत करके वह हिंदी साहित्य को दरअसल एक धरोहर सौंप गए।
आज वह हमारे बीच डॉ. बुधोलिया सशरीर भले नहीं हैं, लेकिन उनकी यह अमर कृति योगों युगों तक हिंदी साहित्य के पाठकों को अनुप्राणित करती रहेगी ! उन्ही के द्वारा श्रीमद्भगवतगीता महाकाव्य की छंदोंमयी श्रंखला श्रीकृष्णार्जुन संवाद धारावाहिक की80 वी कड़ी.. 

नौवां अध्याय : राजविद्या-राजगुह्य योग

 

मिलते हैं उन्हें देवतागण, जो रहे उपासक देवों के,

होते हैं प्राप्त पितर उनको जो करे उपासना पितरों की।

भूतों को भजने वाले को होते हैं प्राप्त भूतगण ही,

अरू जिनकी मुझमें भक्ति रही वे आकर मिलते मुझमें ही।-25

 

जो प्रेमभक्ति के साथ मुझे, जो कुछ भी अर्पित वस्तु करे,

स्वीकार मुझे वह वस्तु रही, मन मेरा प्रीति भरा उमगे।

हो पत्र, पुष्प, फल, जल अर्पित, मैं ग्रहण प्रीति के साथ करूँ,

बस मुझे चाहिये भक्ति भाव, भक्तों के प्रति मैं नित उमगूँ।-26

 

इसलिये कर्म जो कुछ करता, मेरे प्रति उन्हें समर्पित कर,

कौन्तेय हवन जो कुछ करता, उसका भी मुझे समर्पण कर।

जितना जो कुछ भी दान करे, कर उसे समर्पित तु मुझको,

जो करे तपस्या धर्म करे, उन सबका अर्पण कर मुझको।-27

 

इस तरह मुक्त हो जायेगा, अपने कर्मों के दोषों से,

फल रहे शुभाशुभ कर्मों के, होगा तू पापमुक्त उनसे।

धारण करे फिरे सन्यास योग, तू युक्तचित्त होकर अविचल,

कर प्राप्त मुझे मेरा स्वरूप-भासित होगा तुझमें अविकल।-28

 

मेरा न किसी से द्वेष रहा, मेरी न किसी से प्रीति रही,

समभाव सभी के साथ रखूँ, सब जीवों पर समदृष्टि रही।

पर भक्ति भाव पूरित प्राणी, सेवारत ध्यान रखे मेरा

वे मेरे प्रिय मुझमें बसते, उनमें निवास रहता मेरा।-29  क्रमशः…