गेहॅू की उन्नत किस्मों का उत्पादन और कटाई का प्रदर्शन ..

कलेक्टर ने विकासखंड छिंदवाड़ा के ग्राम सलैया, सोनापिपरी, खमरा एवं विकासखंड चौरई के ग्राम चांद में उप संचालक कृषि जितेन्द्र कुमार सिंह ने कृषि वैज्ञानिकों एवं विभागीय अधिकारियो के साथ नरवाई प्रबंधन अंतर्गत गेहॅॅू फसल की कटाई का अवलोकन किया । ग्राम सलैया में जलवायु अनुकूल कृषि कार्यक्रम के तहत कृषक संजीव रघुवंशी के खेत में गेहॅू की विभिन्न नवीनतम किस्में  जिनकी जीरोटिलेज तकनीक अंतर्गत सुपर सीडर के माध्यम से खरीफ फसल धान की कटाई उपरांत फसल के अवषेष प्रबंधन करते हुए सीधी बोनी की गई थी। फसल की विभिन्न किस्मों की फसल कटाई कृषि अधिकारियों, कृषि वैज्ञानिकों एवं क्षेत्र के कृषकों के समक्ष की गई ..
किसानों ने मौके पर ही फसल विश्लेषण के बेहतर परिणाम देखे और इस तकनीक को अपनाने के प्रति उत्साहित नजर आए। यह प्रयास न केवल फसल उत्पादकता बढ़ाने में सहायक है, बल्कि मृदा संरक्षण, जल बचाव और पर्यावरण संतुलन बनाए रखने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाने की बात दीपेन्द्र सिंह तकनीकी सहायक बीसा ने कही। यह कार्यक्रम किसानों के लिए एक प्रेरणादायक कदम साबित हुआ, जो भविष्य में सतत और लाभकारी कृषि की दिशा में योगदान देगा।
उप संचालक कृषि जितेन्द्र कुमार सिंह द्वारा गेहॅू फसल कटाई उपरांत सुपर सीडर / हैप्पी सीडर कृषि यंत्र से खेत मे बचे शेष फसल अवषेषों का प्रबंधन कर भूमि उर्वरकता बढाने के साथ साथ आगामी फसल की सीधी बोनी के फायदे के संबंध मे किसानों को समझाया
भ्रमण के इसी क्रम में ग्राम सोनापिपरी के कृषक श्री राघवेन्द्र रघुवंषी के द्वारा सुपर सीडर के माध्यम से गेहॅू फसल के अवषेष प्रबंधन के साथ मूंग फसल की गई सीधी बोनी का अवलोकन किया गया। वहीं विकासखंड चौरई के ग्राम चांद मे कृषक  प्रवेष रघुवंशी के द्वारा सुपर सीडर के माध्यम से गेहॅू के फसल अवषेष का निस्तारण करते हुए मूंग की सीधी बोनी कृषि वैज्ञानिकों, क्षेत्र के जनप्रतिनिधि एवं कृषकों के समक्ष की गई।
कृषक श्री प्रवेष रघुवंषी के द्वारा बताया गया कि गत दो वर्षो से लगातार इस तकनीक का उपयोग करके मक्का फसल के उपरांत गेहॅू  व सरसों की बोनी और गेहॅू फसल के उपरांत मूंग फसल की बोनी की गई है, जिसके बहुत अच्छे परिणाम प्राप्त हो रहे।
डीन उद्यानिकी महाविद्यालय चंदनगांव डॉ. आर.सी. शर्मा द्वारा तकनीक की उपयोगिता बताते हुए क्षेत्र के किसानों को कास्त लागत को सीमित करने, मृदा स्वास्थ्य एवं पर्यावरण स्वास्थ्य की दृष्टि से कारगार साबित है, किसानों को नरवाई मे आग न लगाने और खरीफ, रबी दोनो सीजन में नरवाई प्रबंधन करने के लिए प्रेरित किया।