श्रीकृष्णार्जुन संवाद धारावाहिक की 75 वी कड़ी.. 

मध्य प्रदेश के नरसिंगपुर जिले की माटी के मूर्धन्य साहित्यकार स्वर्गीय डॉक्टर रमेश कुमार बुधौलिया जी द्वारा रचित ‘श्रीकृष्णार्जुन संवाद ,धार्मिक साहित्यिक धरोहर है, जिसमे डॉक्टर साहब द्वारा श्रीमद्भगवतगीता  का भावानुवाद किया है ! श्रीमद्भगवतगीता के 700 संस्कृत श्लोकों को ‘श्रीकृष्णार्जुन संवाद में मात्र 697 विलक्ष्ण छंदों में समेटा गया है। गीता के समस्त अठारह अध्यायों का डॉ. बुधौलिया ने गहन अध्ययन करके जो काव्यात्मक प्रदेय हमें सौंपा है, वह अभूतपूर्व है। इतना प्रभावशाली काव्य-रूप बहुत कम देखने को मिलता है। जिनमें सहज-सरल तरीके से गीताजी को समझाने की सार्थक कोशिश की गई है।
इस दिशा में डॉ. बुधौलिया ने स्तुत्य कार्य किया। गीता का छंदमय हिंदी अनुवाद प्रस्तुत करके वह हिंदी साहित्य को दरअसल एक धरोहर सौंप गए।
आज वह हमारे बीच डॉ. बुधोलिया सशरीर भले नहीं हैं, लेकिन उनकी यह अमर कृति योगों युगों तक हिंदी साहित्य के पाठकों को अनुप्राणित करती रहेगी ! उन्ही के द्वारा श्रीमद्भगवतगीता महाकाव्य की छंदोंमयी श्रंखला श्रीकृष्णार्जुन संवाद धारावाहिक की 75 वी कड़ी.. 

नौवां अध्याय : राजविद्या-राजगुह्य योग

श्री भगवानुवाच :-

भगवान कृष्ण ने कहा पार्थ तू भक्त शुद्ध ईर्ष्या विहीन,

इसलिये तुझे बतलाता हूँ, यह ज्ञान पर अति गोपनीय।

तू इसे जान विज्ञान सहित मन का सनताप हटायेगा,

जग-जीवन के सब क्लेशों से, तू त्वरित मुक्ति पा जायेगा।-1

 

पावन पुनीत यह दिव्य ज्ञान, राजा है सब विधाओं का,

जो गूढ़ रहे, जो गोपनीय, राजा उन सभी रहस्यों का।

यह परम शुद्ध है परम धर्म, करवाता जो साक्षात्कार,

साधन करने में रहा सुगम, यह मत-दर्शन का रहा सार।-2

 

हे शत्रु विजेता अर्जुन जो, इस भक्ति योग से विमुख रहे,

या श्रद्धाहीन चले पथ पर, वे मुझकों नहीं कदापि मिले।

वे प्राप्त नहीं होते मुझको, बस रहें भटकते उस जग में,

जो मृत्यु रूप विकराल रहा, सुख शान्ति नहीं जिस जीवन में।-3

 

मेरी प्राकृत इन्दियाँ सजग, इनसे अतीव अव्यक्त रूप,

सम्पूर्ण जगत में व्याप्त रहा, मेरा वह ही अव्यक्त रूप।

जड़ चेतन यह ब्रह्माण्ड सकल, मुझ में ही सदा अवस्थित है,

पर मैं उनमें हूँ नहीं पार्थ, यह जग क्रम पूर्ण व्यवस्थित है।-4   क्रमशः…