रचित ‘श्रीकृष्णार्जुन संवाद ,धार्मिक साहित्यिक धरोहर है, जिसमे डॉक्टर साहब द्वारा श्रीमद्भगवतगीता का भावानुवाद किया है ! श्रीमद्भगवतगीता के 700 संस्कृत श्लोकों को ‘श्रीकृष्णार्जुन संवाद में मात्र 697 विलक्ष्ण छंदों में समेटा गया है। गीता के समस्त अठारह अध्यायों का डॉ. बुधौलिया ने गहन अध्ययन करके जो काव्यात्मक प्रदेय हमें सौंपा है, वह अभूतपूर्व है। इतना प्रभावशाली काव्य-रूप बहुत कम देखने को मिलता है। जिनमें सहज-सरल तरीके से गीताजी को समझाने की सार्थक कोशिश की गई है।आठवाँ अध्याय : अक्षर-ब्रह्म योग
जब मिले मार्ग में धूम देव, अभिमानी देव यामिनी का,
अरू कृष्ण पक्ष का देव मिले, अभिमान प्रदर्शित जो करता।
षटमास देव सब अभिमानी, जब सूर्य दक्षिणायन होता,
योगी पाता है चन्द्रलोक, जीवन से मुक्त नहीं होता।-25
हे अर्जुन मत यह वेदों का, जग से प्रयाण जब मनुज करे,
दो रहे मार्ग उसके आगे, वे शुक्ल रहे या कृष्ण रहे।
जो शुक्ल मार्ग उस पर चलकर, जीवन यात्री सद्गति पाता,
अरू कृष्ण मार्ग का पथिक सदा, रहता है बस आता-जाता।-26
जो तत्व निहित इन मार्गो का, हे अर्जुन, जिसने भी जाना,
वह भक्त हमेशा सजग रहे, दुष्वार कि मोहित हो पाना।
पथ एक रहा नित आलोकित, दूजे पर छाया तिमिर निकर,
इसलिये मोह को तज अर्जुन, पालन तू भक्ति योग का कर।-27
अपना वेदाध्ययन परिचर्या, स्वाध्याय दान, तप यज्ञ, सभी,
क्रियाएँ जीवन की सकाम, अरू दर्शन, ज्ञान विधान सभी।
इन सबके पुण्य फलों को तज, जो भक्ति योग पालन करता,
वह अन्त समय में हे अर्जुन, मेरा ही परम धाम वरता।।-28
॥ इति अष्टम अध्याय ॥