रचित ‘श्रीकृष्णार्जुन संवाद ,धार्मिक साहित्यिक धरोहर है, जिसमे डॉक्टर साहब द्वारा श्रीमद्भगवतगीता का भावानुवाद किया है ! श्रीमद्भगवतगीता के 700 संस्कृत श्लोकों को ‘श्रीकृष्णार्जुन संवाद में मात्र 697 विलक्ष्ण छंदों में समेटा गया है। गीता के समस्त अठारह अध्यायों का डॉ. बुधौलिया ने गहन अध्ययन करके जो काव्यात्मक प्रदेय हमें सौंपा है, वह अभूतपूर्व है। इतना प्रभावशाली काव्य-रूप बहुत कम देखने को मिलता है। जिनमें सहज-सरल तरीके से गीताजी को समझाने की सार्थक कोशिश की गई है।आठवाँ अध्याय : अक्षर-ब्रह्म योग
पा लिया मुझे जिन भक्तो ने फिर उनका जन्म नहीं होता,
वे रहे महात्मा योगी जन, उनका उद्धार स्वयं होता।
जग यह अनित्य दुख दाह भरा, उनको न प्रभावित कर पाये,
संसिद्धि प्राप्त कर भक्त स्वयं, भावित प्रभुता से हो जाये।-15
ऊपर से लेकर नीचे तक, प्राकृत जग के जो लोक रहे,
अरू ब्रह्म लोक भी उन सबसे, नश्वरता गुण में साथ जुड़े।
होता है पुनरागमन यहाँ, क्रम जन्म-मृत्यु का दुःखदायी,
पर पुनर्जन्म से मुक्त रहा वह, जिसने मेरी गति पाई।-16
युग चार बीतने पर अर्जुन, होता युग चक्र एक पूरा,
ऐसे सहस्त्र युग चक्र रहे, तब ब्रह्म का दिन हो पूरा।
इतनी ही लम्बी रात रही, ब्रह्म की अरू यह अहोरात्र
हे काल तत्व के सागर की, मापक कोई अणु बूँद मात्र।-17
क्षेपक :-
सत त्रेता द्वापर अरू कलयुग, ये चार युगीतक एक रहा,
गत हुए युगीतक जब हजार, तब एक दिवस का कल्प बना।
दो कल्प मिलाकर अहोरात्र, अर्थात एक दिन ब्रह्मा का।
सौ वर्ष आयु इस गणना से, लगता न अन्त है ब्रह्मा का-अ
पर उसे नित्यता से नापे, यह आयु कौंध ज्यों बिजली की,
जो क्षणिक रही नश्वर जग में, पल भर में ही ओझल होती।
प्राकृत जग के स्वामी ब्रह्मा-उन जैसा जगत अनित्य रहा,
बुद बुद जैसा सागर तल, पल में उभरा पल में बिखरा।-ब
सतयुग में है सत्यांश अधिक, अत्यल्प पाप का अंश रहे.
त्रेता में सत्य घटे थोड़ा, थोड़ा त्रुता में पाप बढ़े।
द्वापर में दोनों सम होते, जितना है पुण्य पाप उतना,
कलयुग में लेकिन पुण्य घटे, बस पापाचार बढ़े दुगुना। स
होता है प्रलय न बचता कुछ, फिर नये सिरे से सृष्टि बसे,
स्रष्टा ब्रह्मा होता पैदा, फिर से वह अपनी सृष्टि रचे।
हो रहा उदय ब्रह्माओं का, हो रहा विलय उनका प्रतिक्षण
जीवन कितना भी लम्बा हो, होता पर क्षणभंगुर जीवन। द
आता है जब ब्रह्मा का दिन, यह जीव समूह प्रगट होता,
अव्यक्त जहाँ से आता वह, अव्यक्त, जहाँ पर यह खोता।
आती जब रात्रि विधाता की, लय होता जीव-समूह सभी,
दिन में जो प्राप्त कलेवर थे, जब हुई रात वे छिपे सभी।-18