श्रीकृष्णार्जुन संवाद धारावाहिक की 71 वी कड़ी..

मध्य प्रदेश के नरसिंगपुर जिले की माटी के मूर्धन्य साहित्यकार स्वर्गीय डॉक्टर रमेश कुमार बुधौलिया जी द्वारा रचित ‘श्रीकृष्णार्जुन संवाद ,धार्मिक साहित्यिक धरोहर है, जिसमे डॉक्टर साहब द्वारा श्रीमद्भगवतगीता  का भावानुवाद किया है ! श्रीमद्भगवतगीता के 700 संस्कृत श्लोकों को ‘श्रीकृष्णार्जुन संवाद में मात्र 697 विलक्ष्ण छंदों में समेटा गया है। गीता के समस्त अठारह अध्यायों का डॉ. बुधौलिया ने गहन अध्ययन करके जो काव्यात्मक प्रदेय हमें सौंपा है, वह अभूतपूर्व है। इतना प्रभावशाली काव्य-रूप बहुत कम देखने को मिलता है। जिनमें सहज-सरल तरीके से गीताजी को समझाने की सार्थक कोशिश की गई है।
इस दिशा में डॉ. बुधौलिया ने स्तुत्य कार्य किया। गीता का छंदमय हिंदी अनुवाद प्रस्तुत करके वह हिंदी साहित्य को दरअसल एक धरोहर सौंप गए।
आज वह हमारे बीच डॉ. बुधोलिया सशरीर भले नहीं हैं, लेकिन उनकी यह अमर कृति योगों युगों तक हिंदी साहित्य के पाठकों को अनुप्राणित करती रहेगी ! उन्ही के द्वारा श्रीमद्भगवतगीता महाकाव्य की छंदोंमयी श्रंखला श्रीकृष्णार्जुन संवाद धारावाहिक की 71 वी कड़ी..     

आठवाँ अध्याय : अक्षर-ब्रह्म योग

जो अचल भाव से अन्त समय, अपने मन को एकाग्र करे,

भ्रकुटी के मध्य ऊर्ध्वरेवा प्राणों का जो आधान करे।

सम्पूरित भक्ति भावना से, करता जो जन भगवत्स्मरण,

भगवान प्राप्त होते उसको, सार्थक होता उसका जीवन।-10

 

हे पार्थ ब्रह्मा जो निर्विशेष, ओंकार मन्त्र पावन जिसका

विद्वान वेदवादी महर्षि, साधन करते जिसके जप का।

करते प्रवेश वे अनासक्त, ब्रत ब्रह्मचर्य का धारण कर

सारांश कहूँ उसका तुझसे, उस मुक्तिमार्ग पर तू पग धर।।-11

 

पालन कर योग-धारणा तू, इन्द्रिय द्वारों का कर विरोध,

अन्तर्यामी परमात्मा में, मन संस्थापित पर निर्विरोध।

मस्तक में ऊर्ध्वारोहण से संस्थापित कर तू प्राणवायु,

ध्यानस्थ योग में मेरे हो, हे पार्थ, प्राप्त कर तू चिरायु ।।-12

 

इस योग धारणा में बसकर जो अक्षर ब्रह्म को पहिचाने

उच्चारित पावन मन्त्र करे, जो ब्रह्म रूप मुझको माने।

इस तरह ध्यान मेरा करता, तजता है जो शरीर, अर्जुन

मिलता है भगवद्धाम उसे, सार्थक होता उसका जीवन।-13

 

हे अर्जन भाव अनन्य लिये, जो नित्य निरन्तर भजे मुझे,

उसका हित मैं देखा करता, मैं रहूँ सहज उपलब्ध उसे ।

संलग्न भक्ति में वह मेरी, अन्यान्य ध्यान कुछ भी न रखे,

उस निरासक्त में मुक्ति हेतु, बाकी कोई इच्छा न बचे।-14   क्रमशः…