श्रीकृष्णार्जुन संवाद धारावाहिक की 70 वी कड़ी..

मध्य प्रदेश के नरसिंगपुर जिले की माटी के मूर्धन्य साहित्यकार स्वर्गीय डॉक्टर रमेश कुमार बुधौलिया जी द्वारा रचित ‘श्रीकृष्णार्जुन संवाद ,धार्मिक साहित्यिक धरोहर है, जिसमे डॉक्टर साहब द्वारा श्रीमद्भगवतगीता  का भावानुवाद किया है ! श्रीमद्भगवतगीता के 700 संस्कृत श्लोकों को ‘श्रीकृष्णार्जुन संवाद में मात्र 697 विलक्ष्ण छंदों में समेटा गया है। गीता के समस्त अठारह अध्यायों का डॉ. बुधौलिया ने गहन अध्ययन करके जो काव्यात्मक प्रदेय हमें सौंपा है, वह अभूतपूर्व है। इतना प्रभावशाली काव्य-रूप बहुत कम देखने को मिलता है। जिनमें सहज-सरल तरीके से गीताजी को समझाने की सार्थक कोशिश की गई है।
इस दिशा में डॉ. बुधौलिया ने स्तुत्य कार्य किया। गीता का छंदमय हिंदी अनुवाद प्रस्तुत करके वह हिंदी साहित्य को दरअसल एक धरोहर सौंप गए।
आज वह हमारे बीच डॉ. बुधोलिया सशरीर भले नहीं हैं, लेकिन उनकी यह अमर कृति योगों युगों तक हिंदी साहित्य के पाठकों को अनुप्राणित करती रहेगी ! उन्ही के द्वारा श्रीमद्भगवतगीता महाकाव्य की छंदोंमयी श्रंखला श्रीकृष्णार्जुन संवाद धारावाहिक की 70 वी कड़ी..     

आठवाँ अध्याय : अक्षर-ब्रह्म योग

जो नित भजता रहता मुझको, अरू अन्तकाल में याद करें,

या देह त्याग जब करे जीव, मेरा न पार्थ विस्मरण करे।

उसको स्वभाव मेरा मिलता, वह प्राप्त उसी को हो जाता,

इसमें रंचक सन्देह नहीं, वह परमधाम मेरा पाता ।।-5

 

कौन्तेय जीव के अन्तस में जैसा भी भाव रहा करता,

जिसको मन में रखकर प्राणी, तन अपना अन्त समय तजता।

अनुकूल उसी के भावों के मिलती है गति, सन्देह नहीं,

जो अन्त समय का भाव रहा, वह जीवन भर का भाव सही।-6

 

इसलिये पार्थ तू भज मुझको, मेरे स्वरूप का चिन्तन कर,

जो युद्धकर्म तेरा स्वधर्म, उसका पालन कर, उस पर चल।

अर्पित क्रियाएँ कर सारी, मुझमें अपना मन बुद्धि लगा,

अपना जीवन कर ले कृतार्थ, तू अन्त समय में मुझको पा।।-7

 

हे पार्थ अनन्य चित्त से जो, नित परम पुरुष का ध्यान करे,

अभ्यास युक्त रहकर अविचल, जो दिव्य अलौकिक भाव भरे।

वह नित्य निरंतर चिन्तन से, अन्तर्यामी को पा जाता,

अन्तर्यामी को पाकर वह, मेरे स्वरूप का हो जाता।।-8

 

उन पुरुषोत्तम का करे ध्यान, सर्वज्ञ अनादि नियन्ता जो,

शिक्षक सबका अणु से भी लघु, प्रतिपालक सर्व जगत का जो।

सब लोको को करता धारण, जो है अचित्य जो है अगम्य,

तेजोमय सूर्य समान दिव्य, भौतिक तत्वों से परे, रम्य।।-9   क्रमशः…