श्रीकृष्णार्जुन संवाद धारावाहिक की 54 वी कड़ी ..

मध्य प्रदेश के नरसिंगपुर जिले की माटी के मूर्धन्य साहित्यकार स्वर्गीय डॉक्टर रमेश कुमार बुधौलिया जी द्वारा रचित ‘श्रीकृष्णार्जुन संवाद ,धार्मिक साहित्यिक धरोहर है, जिसमे डॉक्टर साहब द्वारा श्रीमद्भगवतगीता  का भावानुवाद किया है ! श्रीमद्भगवतगीता के 700 संस्कृत श्लोकों को ‘श्रीकृष्णार्जुन संवाद में मात्र 697 विलक्ष्ण छंदों में समेटा गया है। गीता के समस्त अठारह अध्यायों का डॉ. बुधौलिया ने गहन अध्ययन करके जो काव्यात्मक प्रदेय हमें सौंपा है, वह अभूतपूर्व है। इतना प्रभावशाली काव्य-रूप बहुत कम देखने को मिलता है। जिनमें सहज-सरल तरीके से गीताजी को समझाने की सार्थक कोशिश की गई है।
इस दिशा में डॉ. बुधौलिया ने स्तुत्य कार्य किया। गीता का छंदमय हिंदी अनुवाद प्रस्तुत करके वह हिंदी साहित्य को दरअसल एक धरोहर सौंप गए।
आज वह हमारे बीच डॉ. बुधोलिया सशरीर भले नहीं हैं, लेकिन उनकी यह अमर कृति योगों युगों तक हिंदी साहित्य के पाठकों को अनुप्राणित करती रहेगी ! उन्ही के द्वारा श्रीमद्भगवतगीता महाकाव्य की छंदोंमयी श्रंखला श्रीकृष्णार्जुन संवाद धारावाहिक की 54 वी कड़ी ..                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                         

पाँचवा अध्याय  : – कर्म-सन्यास योग (कृष्ण भावना भावित कर्म)                                                                                                        

प्रिय वस्तु प्राप्त होने पर जो, कौन्तेय नहीं हर्षित होता,

अरू अप्रिय वस्तु यदि प्राप्त हुई, तो जो उद्विग्न नहीं होता।

जो मोहरहित समबुद्धि पुरुष है परम तत्व का ज्ञान जिसे,

वह ब्रह्मतत्व में ही न बसता कहते हैं, जीवन्मुक्त उसे।-20

 

वह मुक्त पुरुष इन्द्रिय सुख में, या विषय-सुखों में अनासक्त,

हो आत्मलीन अनुभव करता, सुख अनुपम रहकर समाधिस्थ।

एकाग्र भाव रखकर प्रभु में, करता अनन्त सुख-आस्वादन

इन्द्रिय-सुख में उपराम वृत्ति, प्रभु भाव-भावना-भावित मन।-21

 

हे अर्जुन इन्द्रिय भोग सभी, या विषयों से उत्पन्न भोग

केवल दुःख ही न बढ़ाते हैं ये बढ़ा रहे भव-कूप-रोग।

बनने-मिटने का चक्र सदा, इनके कारण चलता रहता,

इसलिये विवेकी पुरुष नहीं, इस विषय भोग में रे रमता।-22

 

झण भंगुर है जग का जीवन, तन का अवसान सुनिश्चित है,

इसलिये नाश के पूर्व ज्ञान, पाना सदैव पुरुषौचित्त है।

जो वेग इन्द्रियों का रोके, अरू काम क्रोध के वेगो को,

वह योगी है, है सुखी वही, वह जीता जीत विरोधों कों-23

 

जिसने आत्मा का सुख जाना, जो क्रियाशील आत्मा में हो,

आत्मा में जिसकी दृष्टि रही, जो अविरल आत्म प्रदीयित हो।

संसिद्ध वही योगी यथार्थ, वह ब्रह्मभूत का पद पाया,

उसको रे भगवद्धाम मिला, उसको न लगे जग की माया।-24   क्रमशः…