रचित ‘श्रीकृष्णार्जुन संवाद ,धार्मिक साहित्यिक धरोहर है, जिसमे डॉक्टर साहब द्वारा श्रीमद्भगवतगीता का भावानुवाद किया है ! श्रीमद्भगवतगीता के 700 संस्कृत श्लोकों को ‘श्रीकृष्णार्जुन संवाद में मात्र 697 विलक्ष्ण छंदों में समेटा गया है। गीता के समस्त अठारह अध्यायों का डॉ. बुधौलिया ने गहन अध्ययन करके जो काव्यात्मक प्रदेय हमें सौंपा है, वह अभूतपूर्व है। इतना प्रभावशाली काव्य-रूप बहुत कम देखने को मिलता है। जिनमें सहज-सरल तरीके से गीताजी को समझाने की सार्थक कोशिश की गई है।पाँचवा अध्याय : – कर्म-सन्यास योग (कृष्ण भावना भावित कर्म)
परमेश्वर ग्रहण नहीं करते, पुण्यों को अथवा पापों को,
जो जीव कमाते हैं, जग में, कर्मों के फल अवदातों को।
आच्छन्न ज्ञान जीवों का है, ढंक लेता है अज्ञान उसे,
हो रहे मोह को प्राप्त सभी, वह भ्रमित ग्रसे अज्ञान जिसे।-15
लेकिन अज्ञान मिटाता जो, जब जीव बोध वह प्राप्त करे,
अन्तस में छाता उजियाला, अज्ञान-तिमिर को ज्ञान हरे।
भासित होता जब ज्ञान-सूर्य, सब तत्व प्रकाशित हो जाते,
सद्गुरू के शरणागत होकर, परब्रह्म तत्व ज्ञानी पाते।-16
तद्रप हुआ है मन जिनका, जिनकी कि बुद्धि तद्रप हुई,
केन्द्रित प्रभु में जिनकी निष्ठा, गति जिनकी भगवद रूप हुई
जो पूर्ण रूप से शरणागत,प्रभु के पापों से मुक्त हुये,
तत्काल जीव वे ज्ञान प्राप्त, निज मुक्ति मार्ग आरूढ़ हुये।-17
सब देहो में, सब रूपों मे, परमात्म एक ही जैसा है,
तत्वज्ञ पुरुष समदृष्टि रखें, व्यवहार एक सा रहता है।
ब्राहाण हो विद्या विनय वान, या गाय, हरित या स्वान रहे,
चाण्डाल रहे या कोई भी, सबके प्रति भाव उदार रहे।-18
इस जीवन में ही जीत चुके, वे जन्म मृत्यु का चक्र पार्थ,
करके स्वरूप साक्षात्कार, समता में अपना चित्त साध,
निर्दोष ब्रह्मावत होकर वे, हो गये ब्रह्मा में परिनिष्ठित
जिनके छूटै है ‘राग’ द्वेष वे जीवन्मुक्त ज्ञानावस्थित।-19 क्रमशः…