श्रीकृष्णार्जुन संवाद धारावाहिक की 32वी कड़ी..   

मध्य प्रदेश के नरसिंगपुर जिले की माटी के मूर्धन्य साहित्यकार स्वर्गीय डॉक्टर रमेश कुमार बुधौलिया जी द्वारा रचित ‘श्रीकृष्णार्जुन संवाद ,धार्मिक साहित्यिक धरोहर है, जिसमे डॉक्टर साहब द्वारा श्रीमद्भगवतगीता  का भावानुवाद किया है ! श्रीमद्भगवतगीता के 700 संस्कृत श्लोकों को ‘श्रीकृष्णार्जुन संवाद में मात्र 697 विलक्ष्ण छंदों में समेटा गया है। गीता के समस्त अठारह अध्यायों का डॉ. बुधौलिया ने गहन अध्ययन करके जो काव्यात्मक प्रदेय हमें सौंपा है, वह अभूतपूर्व है। इतना प्रभावशाली काव्य-रूप बहुत कम देखने को मिलता है। जिनमें सहज-सरल तरीके से गीताजी को समझाने की सार्थक कोशिश की गई है।
इस दिशा में डॉ. बुधौलिया ने स्तुत्य कार्य किया। गीता का छंदमय हिंदी अनुवाद प्रस्तुत करके वह हिंदी साहित्य को दरअसल एक धरोहर सौंप गए।
आज वह हमारे बीच डॉ. बुधोलिया सशरीर भले नहीं हैं, लेकिन उनकी यह अमर कृति योगों युगों तक हिंदी साहित्य के पाठकों को अनुप्राणित करती रहेगी ! उन्ही के द्वारा श्रीमद्भगवतगीता महाकाव्य की छंदोंमयी श्रंखला श्रीकृष्णार्जुन संवाद धारावाहिक की 32वी कड़ी..   
तीसरा अध्याय :  – कर्मयोग-अर्जुन उवाच :-

अर्जुन ने कहा जनार्दन हे, यदि बुद्धियोग यह श्रेष्ठ रहा,

उत्तम सकाम कर्मो सह यह, पुरुषोचित यह अभिप्रेत रहा।

तो क्यों बल पूर्वक यों मुझको, इस युद्ध कार्य में लगा रहे,

यह कर्म विकट भीषण केशव, इसमें प्रवृत्त क्यों करा रहे।-1

 

द्विविधा में पड़ा हुआ हूँ मै, उपदेश आपका समझ सकूँ,

वह मार्ग एक है कौन सही, अपनाऊँ जिसको पकड़ सकूँ।

मति मेरी भ्रमित हुई केशव, मेरे मन की द्विविधा हरिये,

कल्याण निहित मेरा जिसमें पथ एक सुनिश्चित वह कहिये।-2

श्री भगवानुवाच :-

हे अर्जुन तू निष्पाप रहा, पहिले ही मैंने बतलाया,

दो रही कोटियाँ पुरुषों की, जिनने स्वरूप-दर्शन पाया।

साक्षात्कार के लालायित, कुछ सांख्य योग को अपनाते,

कुछ भक्तियोग का पालनकर, परमात्म तत्व को पा

जाते।-3

क्षेपक-3

जो हुआ समर्पित ईश्वर को, करता है अपने कर्म सदा,

वह बुद्धि योग का साधक है, पाता ईश्वर की आश्रयता।

हो जाता इन्द्रिय दमन स्वयं, अन्योन्याश्रित ये योग रहे,

जो कर्मयोग, वह बुद्धि योग, ये सांख्य योग से भिन्न रहे।

 

परब्रह्मत्व के साधक का, जब भक्ति भावना भावित मन,

तब निजस्वरूप वह समझ सके, चिन्मय होता उसका जीवन।

यह कर्म योग में भक्ति-निहित, अमिहित करती है भक्ति योग,

योगार्थ-साधना वह सार्थक, दो बने एक ऐसा सुयोग।

 

निज कर्म त्याग से नहीं कभी, हो जाता कर्म मुक्त जीवन,

पालन स्वधर्म का हुआ नहीं, फिर कैसे कट पाये बन्धन।

अन्तस की शुद्धि न हो पाई, सन्यासी का सन्यास विफल,

कृतकृत्य नहीं वह हो पाया, जो नहीं स्वधर्म में हो तत्पर।-4   क्रमश :…