रचित ‘श्रीकृष्णार्जुन संवाद ,धार्मिक साहित्यिक धरोहर है, जिसमे डॉक्टर साहब द्वारा श्रीमद्भगवतगीता का भावानुवाद किया है ! श्रीमद्भगवतगीता के 700 संस्कृत श्लोकों को ‘श्रीकृष्णार्जुन संवाद में मात्र 697 विलक्ष्ण छंदों में समेटा गया है। गीता के समस्त अठारह अध्यायों का डॉ. बुधौलिया ने गहन अध्ययन करके जो काव्यात्मक प्रदेय हमें सौंपा है, वह अभूतपूर्व है। इतना प्रभावशाली काव्य-रूप बहुत कम देखने को मिलता है। जिनमें सहज-सरल तरीके से गीताजी को समझाने की सार्थक कोशिश की गई है। वे रहे पितामह पितु तुल्य, आचार्य रहे, वे पुत्र रहे,
वे मातुल श्वसुर पौत्र साले, सम्बन्धी वे सब रहे सगे।
अपने प्राणों की रक्षा हित, क्या इनका हनन करूँगा मैं,
मधुसूदन सोच नहीं पाता, क्या इनसे कभी लढूँगा मैं।-34
चाहे त्रिभुवन का राज्य मिले, फिर भी न लढूँगा मैं इनसे,
पृथ्वी का पाने राज्य भला, क्या लड़ सकता हूँ मैं इनसे।
होगी प्रसन्नता क्या मुझको, धृतराष्ट्र सुतो का वध करके,
हो रही जर्नादन ग्लानि मुझे, होगा कदापि न यह मुझसे।-35
श्रीकृष्णार्जुन संवाद
इन आताताइयों के वध से हमको तो पाप लगेगा ही,
फिर बन्धु बांधवों की हत्या करना होगा क्या उचित कभी।
इन सबकी हत्या करने से, क्या होगा लाभ मुझे माधव।
किस तरह मिलेगा सुख मुझको, मैं समझ नहीं पाता माधव।-36 क्रमशः…