श्रीकृष्णार्जुन संवाद धारावाहिक की छटवी कड़ी..

मध्य प्रदेश के नरसिंगपुर जिले की माटी के मूर्धन्य साहित्यकार स्वर्गीय डॉक्टर रमेश कुमार बुधौलिया जी द्वारा रचित ‘श्रीकृष्णार्जुन संवाद ,धार्मिक साहित्यिक धरोहर है, जिसमे डॉक्टर साहब द्वारा श्रीमद्भगवतगीता  का भावानुवाद किया है ! श्रीमद्भगवतगीता के 700 संस्कृत श्लोकों को ‘श्रीकृष्णार्जुन संवाद में मात्र 697 विलक्ष्ण छंदों में समेटा गया है। गीता के समस्त अठारह अध्यायों का डॉ. बुधौलिया ने गहन अध्ययन करके जो काव्यात्मक प्रदेय हमें सौंपा है, वह अभूतपूर्व है। इतना प्रभावशाली काव्य-रूप बहुत कम देखने को मिलता है। जिनमें सहज-सरल तरीके से गीताजी को समझाने की सार्थक कोशिश की गई है।
इस दिशा में डॉ. बुधौलिया ने स्तुत्य कार्य किया। गीता का छंदमय हिंदी अनुवाद प्रस्तुत करके वह हिंदी साहित्य को दरअसल एक धरोहर सौंप गए।
आज वह हमारे बीच डॉ. बुधोलिया सशरीर भले नहीं हैं, लेकिन उनकी यह अमर कृति योगों युगों तक हिंदी साहित्य के पाठकों को अनुप्राणित करती रहेगी ! उन्ही के द्वारा श्रीमद्भगवतगीता महाकाव्य की छंदोंमयी श्रंखला श्रीकृष्णार्जुन संवाद धारावाहिक की छटवी कड़ी..       
पहला अध्याय : अर्जुन विषाद योग
अर्जुन उवाच :-

अर्जुन बोले हे अच्युत रथ, ले चलें मध्य सेनाओं के,

स्थपित वहाँ करे रथ को, परिचय पा सकूँ सभी जन के।-21

 

उनके, जो लड़ने को आये हैं, कौन कौन योद्धागण वे,

करना है जिनसे युद्ध मुझे, जो अभिलाषी समरांगण के।-22

 

जो युद्ध भूमि में आये हैं, दुर्मति दुर्योधन के हितकर,

उसकी प्रसन्नता चाह रहे, जो विध्वंशक रण से जुड़कर।

प्रिय बनकर आने वाले ये, है कौन देखना चाह रहा,

कितना हित साध सकेंगे वे, अवगाह सकूँ मैं चाह रहा।-23

संजय उवाच :-

सुन गुडाकेश का सम्बोधन, रथ दिव्य हॉकते हृषीकेश

स्थापित करने ले जाते, दो सेनाओं के मध्य-क्षेत्र।

इस तरह बीच सेनाओं के, रथ को पहुँचाकर मधुसूदन

सम्बोधित अर्जुन को करके, भरतेश, उन्होंने कहे वचन।-24    क्रमशः…