‘गीता ज्ञान प्रभा ‘ धारावाहिक 265 ..

मध्य प्रदेश के नरसिंगपुर जिले की माटी के मूर्धन्य साहित्यकार स्वर्गीय डॉक्टर रमेश कुमार बुधौलिया जी द्वारा रचित ‘गीताज्ञानप्रभा’ ग्रंथ एक अमूल्य ,धार्मिक साहित्यिक धरोहर है, जिसमे डॉक्टर साहब द्वारा ज्ञानेश्वरीजी महाराज रचित ज्ञानेश्वरी गीता का भावानुवाद किया है, श्रीमद्भगवतगीता के 700 संस्कृत श्लोकों को गीता ज्ञान प्रभा में 2868 विलक्ष्ण छंदों में समेटा गया है।
उन्ही के द्वारा श्रीमद्भगवतगीता महाकाव्य की छंदोंमयी श्रंखला ‘गीता ज्ञान प्रभा‘ धारावाहिक की 265 वी कड़ी..                      अष्टादशोऽध्यायः- ‘मोक्ष सन्यास योग’
‘निष्कर्ष योग’ समस्त अध्यायों का सार संग्रह । मोक्ष के उपायभूत सांख्ययोग (सन्यास) कर्मयोग (त्याग) का अंग प्रत्यंगों सहित वर्णन ।

श्लोक  (७७)

भगवान कृष्ण का दिव्य रुप, नयनों में भरता है ललकन,

उसकी मैं पुनि पुनि सुधि करता, राजन, तन में होती पुलकन,

सुधि करता, प्रभुदित होता मैं, साक्षात किया मैंने दर्शन

वह परम अनूठा रुप रहा, आश्चर्य चकित है मेरा मन ।

श्लोक  (७८)

योगेश्वर हों श्री कृष्ण जहाँ, अरु जहाँ धनुर्धर हों अर्जुन,

बसती है वहाँ राजलक्ष्मी, सम्पत्ति विपुल अरु अक्षय धन,

ऐश्वर्य समस्त वहाँ होता, होती है विजय अटल, राजन!

होती है शक्ति नीति होती, ऐसा कहता है मेरा मन ।

 

गीता का उपदेश योग है, मानव जाने हर मानव के,

जिसके उपदेशक योगेश्वर, भीतर बसता है परमेश्वर,

आत्मा जिस क्षण जागृत होती, परमात्मा से जुड़ जाती है,

सौभाग्य, विजय, कल्याण, मुक्ति, नैतिकता ज्यों खिल जाती है।

 

संयोग योग का ऊर्जा से, हो जहाँ, वहाँ श्री विजय रही,

संजय द्वारा अंतिम पद में यह बात सार की कही गई,

बिगड़ा यदि योग हुए पागल, बिगड़ी ऊर्जा विध्वंश हुआ ।

समुचित जब रहा समन्वय तब, केन्द्रीय तत्व दर्शन उभरा।

 

आत्मिक उन्नयन समाज सेवा, दोनों जब चलते साथ-साथ,

पूर्णत्व प्राप्त करता मनुष्य, कल्याण परक होता विकास ।

योगेश्वर कृष्ण जहाँ होते, अर्जुन हो जहाँ धनुर्धारी,

निश्चित श्री विजय वहाँ होती, होती सुख शांति वहाँ सारी ।

                                                 ।卐 । इति मोक्ष सन्यास योगो नाम अष्टादशोऽधयः ।卐 ।

                                                               :: इति श्रीमदभागवतगीता उपनिषदःः

 

प्रिय पाठको

आपके प्यार और  विश्वास के चलते हमे यह हौंसला मिला की हमने  13 अक्टूवर २०२३ से निरंतर आज तक २६५  कड़ियों में (१० माह ) ” श्रीमद भगवत गीता ” जैसे महानतम ग्रन्थ आप तक पहुचाने का साहस किया है ! हमारे इस प्रयास पर सदैव आपका प्यार और पीठ पर शाबाशी की थाप के स्नेह लेप लगाने का काम किया है ! इसके लिए हम आपके आभारी है और दिली इच्छा है की आपका प्यार इसी तरह हमारे हौंसले बुलंद करता रहेगा ताकि हम आध्यात्म के धरातल पर किसी और महानतम ग्रन्थ की यात्रा  आपकी अंगुली पकड़ कर पूरी कर सकें ! 

धन्यवाद 

राकेश प्रजापति