‘गीता ज्ञान प्रभा ‘ धारावाहिक 264 ..

मध्य प्रदेश के नरसिंगपुर जिले की माटी के मूर्धन्य साहित्यकार स्वर्गीय डॉक्टर रमेश कुमार बुधौलिया जी द्वारा रचित ‘गीताज्ञानप्रभा’ ग्रंथ एक अमूल्य ,धार्मिक साहित्यिक धरोहर है, जिसमे डॉक्टर साहब द्वारा ज्ञानेश्वरीजी महाराज रचित ज्ञानेश्वरी गीता का भावानुवाद किया है, श्रीमद्भगवतगीता के 700 संस्कृत श्लोकों को गीता ज्ञान प्रभा में 2868 विलक्ष्ण छंदों में समेटा गया है।
उन्ही के द्वारा श्रीमद्भगवतगीता महाकाव्य की छंदोंमयी श्रंखला ‘गीता ज्ञान प्रभा‘ धारावाहिक की 264 वी कड़ी..                      अष्टादशोऽध्यायः- ‘मोक्ष सन्यास योग’
‘निष्कर्ष योग’ समस्त अध्यायों का सार संग्रह । मोक्ष के उपायभूत सांख्ययोग (सन्यास) कर्मयोग (त्याग) का अंग प्रत्यंगों सहित वर्णन ।

श्लोक  (७४)

संजय उवाच-

संजय बोले, सौभाग्य रहा, जो मैंने यह अवसर पाया,

सम्वाद कृष्ण अरु अर्जुन का, मैं जो अविकल सुन पाया,

सचमुच महान ये आत्माएँ, वार्ता करतीं, विस्मकारी,

सुनकर जिसको रोमांचित मैं जो जीवन को मंगलकारी

श्लोक   (७५)

गुरु व्यास देव की कृपा रही सामर्थ्य मिला, अवसर पाया,

अर्जुन के प्रति जो कहा गया, वह मैं अविकल सुन पाया,

श्रीकृष्ण परम योगेश्वर की साक्षात सुनी मैंने वाणी

व्याख्या योगों की गोपनीय सुन मुक्ति प्राप्त करता प्राणी ।

श्लोक   (७६)

भगवान कृष्ण अरु अर्जुन के, राजन अद्भुत संवाद सुने,

सुधि करता उनकी बार बार, मन में आनन्द अमित उपजे,

हर्षित होता हूँ रोमांचित, क्षण प्रतिक्षण उसकी सुधि आती,

अन्तस्तल आलोकित होता, अतिदिव्य छटा सी छा जाती । क्रमशः….