‘गीता ज्ञान प्रभा ‘ धारावाहिक 258 ..

मध्य प्रदेश के नरसिंगपुर जिले की माटी के मूर्धन्य साहित्यकार स्वर्गीय डॉक्टर रमेश कुमार बुधौलिया जी द्वारा रचित ‘गीताज्ञानप्रभा’ ग्रंथ एक अमूल्य ,धार्मिक साहित्यिक धरोहर है, जिसमे डॉक्टर साहब द्वारा ज्ञानेश्वरीजी महाराज रचित ज्ञानेश्वरी गीता का भावानुवाद किया है, श्रीमद्भगवतगीता के 700 संस्कृत श्लोकों को गीता ज्ञान प्रभा में 2868 विलक्ष्ण छंदों में समेटा गया है।
उन्ही के द्वारा श्रीमद्भगवतगीता महाकाव्य की छंदोंमयी श्रंखला ‘गीता ज्ञान प्रभा‘ धारावाहिक की 258 वी कड़ी..                      अष्टादशोऽध्यायः- ‘मोक्ष सन्यास योग’
‘निष्कर्ष योग’ समस्त अध्यायों का सार संग्रह । मोक्ष के उपायभूत सांख्ययोग (सन्यास) कर्मयोग (त्याग) का अंग प्रत्यंगों सहित वर्णन ।

श्लोक  (६०)

हे कुंतीनंदन, कर्म पूर्वकृत, रचते हैं तेरा स्वभाव

उसके आश्रित तू कर्म करे, कर्मों पर जो डाले प्रभाव

अपने स्वभाव की शक्ति मुझे, कर देगी बाध्य कर्म करने

वह कर्म, मोह के वशीभूत, तू नहीं प्रवृत जिसको करने ।

 

क्षत्रिय का धर्म युद्ध करना, यह प्रकृत कर्म, यह पाप नहीं

क्षत्रिय का युद्ध विमुख होना, यह छात्र-धर्म के उचित नहीं

इच्छा न रहे, फिर भी स्वभाव, अपना जो कार्य करा लेता

पर मुक्ति वही पाता अर्जुन, जो मेरा कर्माश्रय लेता ।

 

मैं धान न जैसा ऊगूंगा, यदि कहे धान का कण ऐसा,

क्या सम्भव है यह, हे अर्जुन, वह होगा ही स्वभाव जैसा ।

होती स्वभाव की अपनी गति, विपरीत दिशा दुष्वार रहे,

हो युक्ति युक्त संवाहन तब, धारा से कोई पार लगे

 

होती न अनिच्छा अर्थवती, प्रारब्ध कार्य करवा लेता,

बिन चले पैर से ज्यों मनुष्य, बहुतेरा पथ तय कर लेता ।

जो हाथ-पैर से बंधा मगर, अर्जुन रथ पर आसीन रहा,

बिन चले पैर से अपने वह, कितनी ही दूर बलात चला ।

 

चलने चलने में अंतर है, इच्छा से चलना अलग रहा,

फिर कर्मयोग का यदि पालन, हो मन में सात्विक भाव जगा।

वह कर्म विहित कर्तव्य बने, जिसमें हरि इच्छा विद्यमान,

कल्याण निहित उसमें रहता, हैं आप्तवाक्य जिसके प्रमाण ।

 

हे अर्जुन मोह ग्रसित होकर, तू भले उपेक्षा कर मेरी,

आज्ञा का पालन नहीं करे, मत करे कर्म मति का मेरी ।

पर कर्म वही तुझको बरबस, कुंतीनंदन करना होगा

तेरा स्वभाव जैसा उसके अनुसार तुझे चलना होगा ।

श्लोक  (६१)

हे अर्जुन हृदयों में सबके, बैठा होता अंतर्यामी,

जग-जीवों का जीवन सारा,वह चला रहा अन्तर्यामी ।

वह देह यन्त्र का चालक बन, जग जीवन मात्र को घुमा रहा,

माया की उसकी शक्ति रही, जिससे वह सबको चला रहा ।

 

रे प्राणिमात्र के अन्तस में, बसता है ईश्वर सुन अर्जुन,

वह सबको ऐसे घुमा रहा, ज्यों किसी यन्त्र पर करें भ्रमण ।

वह मार्ग प्रदर्शक बनता है, निर्धारित करता है विकास,

घटनाएँ करता संचालित, जीवन देता, देता प्रकाश ।

 

वह भाग्य नियामक बनता है, करता स्वभाव का निर्धारण,

कर्मो का लेखा रखता है, करता गतिविधि का संचालन ।

वह आत्म आन्तरिक तम सबका, अस्तित्ववान करता सबको,

हम भले भूल जाएँ उसको, वह नहीं भूलता हम सबको ।

 

होकर सचेत जुड़कर उससे, जीवन यापन यदि हम करते,

कर्मो का अर्पण कर उसको, अपना सब अहम भाव तजते ।

यदि ऐसा नहीं किया फिर भी, जो सत्य वही विजयी होता,

उससे रह दूर अहंकारी, जीवन की सही दृष्टि खोता ।

 

विश्वात्मा के आगे हमको, यदि आज नहीं कल झुकना है,

पर अंतराल में छूट रही, निर्णय हमको ही करना है ।

सहयोग चाहता स्वेच्छा से, प्रभु नहीं विवशता है कोई,

जब बनें पारदर्शक माध्यम, हम भासित करते उसको ही ।

 

बिन कर्म किए कोई प्राणी, क्षण मात्र नहीं रह सकता है,

वह ही स्वभाव के पराधीन, अपने कर्मो को करता है।

लेकिन स्वतंत्रता है उसको, वह मार्ग मुक्ति का चुन सकता,

कर ग्रहण शरण परमेश्वर की, उद्धार स्वयं का कर सकता । क्रमशः….