‘गीता ज्ञान प्रभा ‘ धारावाहिक 232 ..

मध्य प्रदेश के नरसिंगपुर जिले की माटी के मूर्धन्य साहित्यकार स्वर्गीय डॉक्टर रमेश कुमार बुधौलिया जी द्वारा रचित ‘गीताज्ञानप्रभा’ ग्रंथ एक अमूल्य ,धार्मिक साहित्यिक धरोहर है, जिसमे डॉक्टर साहब द्वारा ज्ञानेश्वरीजी महाराज रचित ज्ञानेश्वरी गीता का भावानुवाद किया है, श्रीमद्भगवतगीता के 700 संस्कृत श्लोकों को गीता ज्ञान प्रभा में 2868 विलक्ष्ण छंदों में समेटा गया है।
उन्ही के द्वारा श्रीमद्भगवतगीता महाकाव्य की छंदोंमयी श्रंखला ‘गीता ज्ञान प्रभा‘ धारावाहिक की 232 वी कड़ी..                      अष्टादशोऽध्यायः- ‘मोक्ष सन्यास योग’
‘निष्कर्ष योग’ समस्त अध्यायों का सार संग्रह । मोक्ष के उपायभूत सांख्ययोग (सन्यास) कर्मयोग (त्याग) का अंग प्रत्यंगों सहित वर्णन ।

श्लोक  (२४)

पर इच्छाओं की पूर्ति हेतु, जो कर्म किए जाते अर्जुन,

जिन कर्मो के संग संग चलता, करने वाले का कर्त्तापन ।

जिनको पूरा करने मनुष्य, झेला करता बहु कठिनाई,

वह कर्म राजसी कहा गया, जिसके संग हार-जीत आई

 

वह कर्म करे जिसको मनुष्य, फल पाने की इच्छा लेकर,

पूरा करने वह कर्म बढ़े, पग-पग पर बहु बाधा सहकर ।

श्रम करना पड़े बहुत जिसको, प्रेरित वह रहे अहमपन से,

वह करे राजसिक कर्म पार्थ, उसको न कर्म हितकर बनते ।

 

अनुभूति कि कार्य कष्टकर है, कर रहे परिश्रम से पूरा,

अवमूल्यन रहा कर्म का यह, कत्र्तापन का यह है चेहरा ।

है काम बड़ा, बलिदान बड़ा, यह कहकर विफल उसे करते,

कर्तव्य कर्म यदि अप्रिय रहा, हम उसमें राजस गुण भरते ।

 

आदर्श हेतु जो किया कर्म, उसका श्रम प्रिय होता अर्जुन,

बलिदान नहीं बलिदान रहे, उसमें भी प्रमुदित रहता मन ।

जो कर्म प्रेम द्वारा होते, वे भिन्न राजसी कर्मो से,

जो दर्शा रहे विवशता को, वे भावित राजस धर्मो से ।

 

नाना प्रकार की क्रियाएँ, क्रियाओं के नाना विधान,

व्यावहारिक काम्य कर्म ऐसे, जो रहे कष्ट दुख के निधान ।

हर कर्म परिश्रम से होता, हर कर्म क्लेश देता मन को,

घेरे रहता है अहंकार, कर्तापन का उसके मन को ।

 

प्रेरित वह रहा कामना से, नित नए कर्म आरंभ करे,

अनुभव श्रम कष्ट करे उनमें, फिर भी करता विस्तार चले ।

इन्द्रिय भोगों में रुचि जागे, आसक्ति रहे लौकिक सुख की,

परमार्थ-स्वार्थ साधा चाहे, चाहे निवृत्ति अपने दुख की ।

 

पने को वह माने विशिष्ट, मैं अमुक कर्म करने वाला,

मेरे समान है कौन यहाँ, मैं सबसे बढ़कर धनवाला ।

यों अहंकार, यो भोगवृत्ति, उसके कर्मो में छा जाते,

सात्विकता से वे हीन रहे, वे कर्म राजसी कहलाते ।

 

जो कर्म परिश्रम युक्त रहे, गर्वीला हो जिनका कर्त्ता,

जो लिए कामना भोगों की, दुख सहकर कर्मो को करता ।

नित नए कर्म आरम्भ करे, विस्तार किए जाए उनका,

वे कर्म राजसी कर्म रहे, उन कर्मो में बस दुख फलता ।

 

मीठे न बोल बोले घर में, गैरों को गले लगाता है,

कुछ पाने की आशा में ही, वह सब कुछ खोता जाता है।

कितने ही करता है प्रयास, कितने ही कष्ट उठाता है,

सुख भोग स्वार्थ की पूर्ति हेतु, वह सब सहता जाता है।

 

विज्ञापन करता है अपना, दे दान दक्षिणा दीनों को,

चूहा जैसा खोदे पहाड़, ये कर्म राजसी सब उसके,

कहलाना चाहे कर्मवीर, कहलाना चाहे धर्मवीर ।

बाजीगर सा करतब करता, जिनका वह स्वयं बने कर्त्ता । क्रमशः….