‘गीता ज्ञान प्रभा ‘ धारावाहिक 230..

मध्य प्रदेश के नरसिंगपुर जिले की माटी के मूर्धन्य साहित्यकार स्वर्गीय डॉक्टर रमेश कुमार बुधौलिया जी द्वारा रचित ‘गीताज्ञानप्रभा’ ग्रंथ एक अमूल्य ,धार्मिक साहित्यिक धरोहर है, जिसमे डॉक्टर साहब द्वारा ज्ञानेश्वरीजी महाराज रचित ज्ञानेश्वरी गीता का भावानुवाद किया है, श्रीमद्भगवतगीता के 700 संस्कृत श्लोकों को गीता ज्ञान प्रभा में 2868 विलक्ष्ण छंदों में समेटा गया है।
उन्ही के द्वारा श्रीमद्भगवतगीता महाकाव्य की छंदोंमयी श्रंखला ‘गीता ज्ञान प्रभा‘ धारावाहिक की 230 वी कड़ी..                      अष्टादशोऽध्यायः- ‘मोक्ष सन्यास योग’
‘निष्कर्ष योग’ समस्त अध्यायों का सार संग्रह । मोक्ष के उपायभूत सांख्ययोग (सन्यास) कर्मयोग (त्याग) का अंग प्रत्यंगों सहित वर्णन ।

श्लोक  (२१)

वह ज्ञान मनुज जिसके द्वारा, देखे संसार विविध सारा,

देहों में वह देखे विभिन्न, जीवों का विविध रुप सारा ।

वह नहीं चेतना को देखे, सब कुछ शरीर को ही समझे,

है ज्ञान राजसी हे अर्जुन, जो पृथक न जीवात्मा समझे ।

 

जो ज्ञान विभिन्न प्राणियों में, केवल विभिन्नता को देखे,

अस्तित्व सभी के अलग रहे, ऐसा समझे, ऐसा लेखे ।

जो तत्व चेतना का उसको, सीमित शरीर में कर देता,

वह रहा राजसिक ज्ञान पार्थ, जो विविध रुप में रुचि लेता ।

 

आकृतियाँ तन की भिन्न रहीं, हैं भिन्न स्वभाव प्राणियों के,

आत्मा सबकी है अलग-अलग, अस्तित्व भिन्न सब जीवों के ।

यह नहीं वास्तविक ज्ञान पार्थ, यह नभ को परिच्छिन्न माने,

यह रहा राजसी ज्ञान, नहीं जो आत्म तत्व को पहिचाने ।

 

रहता है जिसका द्वैत भाव, जो भेदभाव का आश्रय ले,

प्रत्यक्ष दीखती वस्तु उसे, निद्रा, विस्मृति से जो ढंक दे ।

जो रखे जीव को धोखे में, बन्धवाये मिथ्या मोह-पाश,

वह रहा राजसिक ज्ञान पार्थ, जो करता है भ्रम का विकास ।

 

वह नाम रुप में छिपा हुआ, रे चेतन तत्व न देख सके,

पहिचान न पाए मिट्टी को, जिसके होते हैं पात्र बने ।

दीपक को देखे किन्तु जिसे, पहिचान अग्नि की नहीं रही,

वह रहा राजसकि ज्ञान जहाँ, वर्गो में सत्ता एक बँटी।

श्लोक  (२२)

जो ज्ञान तत्व से रहित रहा, आसक्त कार्य में ही केवल,

उद्देश्य लिए लौकिक सुख का, अति तुच्छ बढ़ाता बस छल बल।

पशुबल, सोना, खाना, मैथुन, भय में जिसकी आसक्ति रही,

वह ज्ञान तामसी कहा गया, जिसमें न किरण सत की उभरी।

 

समझे शरीर को ही सब कुछ, तन के सुख-दुख से सुखी-दुखी,

तन को ही वह स्वरुप समझे, वह कभी न होता आत्ममुखी।

तन नाश हुआ सर्वस्व नाश, यहः ज्ञान तामसी’ कहलाता,

सच पूछो तो यह ज्ञान नहीं, विपरीत – ज्ञान यह कहलाता ।

 

यह रहा अहैतुक युक्ति हीन, इसमें विवेक का नाम नहीं,

आत्मा को भिन्न समझता है, समझे उसको परिव्याप्त नहीं ।

यह रहा अर्थ से रहित, अल्प, यह त्याज्य और अति तुच्छ रहा,

यह रहा विपर्यय-ज्ञान पार्थ, इसमें रहता अज्ञान भरा ।

 

जो केवल एक कार्य को ही, सब कुछ माने जाने उसको,

देता न किसी की ओर ध्यान, मूरख माने सारे जग को ।

तत्वार्थ स्वयं को ज्ञात नहीं, जो हीन रहा, संकीर्ण रहा,

वह ज्ञान तामसिक ढंग का है, उसको तजने को कहा गया।

 

नैतिकता का जो वस्त्र तजे, हो नग्न करे जग में विचरण,

मादक पदार्थ सेवन करता, जो विधि-विधान का करे क्षरण।

सम्बन्धोंको तोड़े-फोड़े, साधन निषिद्ध, वह अपनाता,

वह तमोगुणी-ज्ञानी ऐसा, व्यवहार अवांछित दिखलाता

 

जो ज्ञान न अन्तर लख पाता, क्या है पवित्र, क्या शुद्ध नहीं,

जिस तरह न भेद कौआ करता, है ताजा भोज्य कि सड़ा कहीं।

मतलब उसका खाने से है, क्या भक्ष्य अभक्ष्य न भेद करे,

अच्छा जल रहा कि जले बुरा, धधकी ज्यों आग न भेद करे।

 

जग भोग्य पदार्थ उसे बनता, उपभोग मात्र उसका जीवन,

भरता ही रहे उदर अपना, लालायित रहे अधिक को मन ।

तन पिण्ड उसे आत्मा लगता, भगवान मूर्ति बस पत्थर की,

अविवेक ढॉक लेता जिसको, उसको न किरण रवि की दिखती।

 

विकृत रहता उसका चिन्तन, वह पाप-पुण्य को ढोंग कहे,

समझे आत्मा को वह शरीर, वह थोथे तर्क-वितर्क करे ।

अन्धे की आँखों के समान, वह लगे देखने में अच्छा,

बहरे के कान समान हीन, वह ज्ञान नहीं सार्थक रहता । क्रमशः….