रचित ‘गीताज्ञानप्रभा’ ग्रंथ एक अमूल्य ,धार्मिक साहित्यिक धरोहर है, जिसमे डॉक्टर साहब द्वारा ज्ञानेश्वरीजी महाराज रचित ज्ञानेश्वरी गीता का भावानुवाद किया है, श्रीमद्भगवतगीता के 700 संस्कृत श्लोकों को गीता ज्ञान प्रभा में 2868 विलक्ष्ण छंदों में समेटा गया है।श्लोक (१८)
नेत्रों का तेज वही रहता, पर क्षीण रात में होता है,
उपयोगी उतना नहीं रहे, जैसा वह दिन में होता है ।
घट जाता है सुख जीवन का, प्रतिकूल भाग्य के होने पर,
होती है शशि की कला क्षीण, दिन दिन तम पक्ष विकसने पर।
ज्ञाता जुड़कर जब इन्द्रिय से, व्यवहार साधता है अपना,
मन बुद्धि चित्त अरु अहंकार, का दल सजता उसका अपना ।
ये अन्तर्बाहृय इन्द्रियाँ सब, उसको सहयोग किया करतीं,
फल प्राप्त न जब तक होता है वे फल पाने सक्रिय रहतीं ।
होता अनुमान कि फल उसको, होगा दुखदायी तब कर्त्ता,
उन दसों इन्द्रियों को तजने, वह कर्म कष्टकर कह देता ।
करता नेतृत्व इन्द्रियों का, ज्ञाता कर्ता बन जाता है,
उपयोग इन्द्रियों का करके, वह अपना कर्म निभाता है।
अर्जुन कर्ता की क्रियाओं में, कर्म समाया रहता है,
गन्ने में रहे मधुरता ज्यों, विस्तार लता में रहता है ।
ज्यों प्रभा सूर्य की व्याप्त, सूर्य के ही प्रकाश में रहती है,
या कलाकार की बुद्धि, कलाकृति के ही साथ उभरती है।
ज्ञाता, ज्ञान, ज्ञेय ये तीनों, कर्म-प्रवृत्ति के जनक रहे,
कर्त्ता, करण, कार्य की तिकड़ी, मिलकर कर्म-विधान रचे ।
सन्निहित अग्नि में धुंआ रहे, ज्यों वृक्ष बीज में रहता है,
कर्त्ता, क्रिया अरु करण सभी, में कर्म समाहित रहता है।
निश्चय करती है ज्ञानवृत्ति, किस साधन से क्या करना है,
अपनाना है विधि कौन मुझे, किस तरह कर्म में बढ़ना है।
यह ज्ञानवृत्ति बनती प्रवृत्ति, जो कर्म पूर्ण करवाती है,
कर्त्ता करता है जिसे पूर्ण, जिसको यह वृत्ति जगाती है।
पूरा न कर्म कोई होता, जब तक न तीन का मेल हुआ,
ये तीन कर्म कर्त्ता साधन, इस तिकड़ी से हर कार्य हुआ ।
मन बुद्धि इन्द्रियाँ साधन हैं, करती हैं जो सम्पन्न कर्म,
करने वाला होता कर्त्ता हो क्रियाशील जो करे कर्म । क्रमशः….