रचित ‘गीताज्ञानप्रभा’ ग्रंथ एक अमूल्य ,धार्मिक साहित्यिक धरोहर है, जिसमे डॉक्टर साहब द्वारा ज्ञानेश्वरीजी महाराज रचित ज्ञानेश्वरी गीता का भावानुवाद किया है, श्रीमद्भगवतगीता के 700 संस्कृत श्लोकों को गीता ज्ञान प्रभा में 2868 विलक्ष्ण छंदों में समेटा गया है।श्लोक (१८)
रे तत्व कर्म के तीन रहे, जो नित्य कर्म प्रेरित करते,
वे ज्ञान ज्ञेय अरु परिज्ञाता जो कर्मो के प्रेरक बनते ।
एवम जो कर्माधार रहे, वे भी हैं तीन घटक अर्जुन,
इन्द्रियाँ, कर्म एवं कर्त्ता, इनके महत्व को कम मत गुन ।
निश्चय पदार्थ का करता जो, कहलाता वह उसका ज्ञाता,
जो वृत्ति विनिश्चय करवाती, उसको ही ‘ज्ञान’ कहा जाता ।
जिसका स्वरुप जाना जाता, वह वस्तु ‘ज्ञेय’कहलाती है,
यह कर्म प्रेरणा त्रिविधा हो, कर्मो का साज सजाती है ।
प्रकृतिस्थ पुरुष जो कर्म करे, वह क्रियाओं का है ‘कर्ता’,
मन बुद्धि, इन्द्रियाँ ‘करण” रहीं, जिनसे रे कर्म किया जाता ।
कृत क्रियाओं का वाचक जो, कहलाता है वह ‘कर्म’पार्थ,
इन तीनों के संग्रह के बिन, सधता न कर्म कोई यथार्थ ।
हर कर्म प्रेरणा से होता, हे पार्थ प्रकार तीन उसके,
वे ज्ञान, कर्म अरु कर्ता हैं, ये कर्म हेतु प्रेरित करते ।
संग्रह होता है कर्मो का, सम्पन्न कर्म जब हो जाते,
साधन कर्ता अरु कर्म तीन, ये आश्रय उनके बन जाते ।
हे अर्जुन, ज्ञाता, ज्ञान ज्ञेय, यह त्रिपुटी कारणभूत रही,
इससे सारा संसार बसा, इससे ही कर्म-प्रवृत्ति जगी ।
सूरज की किरण परस से ज्यों, खिल जाता है सरसिज का वन,
त्यों जीव-वृत्ति की किरणों से, विषयों का मन में खिले चमन।
या खुली पीठ पर घोड़ों की, इन्द्रिय समुदाय सवार हुआ,
करने को लूट भोग-सुख की, मोहक विषयों के देश चला ।
करता है लूट वहाँ जाकर, लाता भोगात्मक सामग्री,
उपभोग ‘जीव’ करता उसका, सुख-दुख मय होती सामग्री ।
निद्रावस्था में ज्ञान रहे, उसको ही ‘जीव’ कहा जाता,
वह जीव रहा ‘ज्ञाता’ बनकर, उसका जो ‘कर्म’ किया जाता ।
विपरीत ज्ञान अविद्या से, पाता है जीव जिसे अर्जुन,
वह तीन भाग में बंट जाता, जड़ को ज्ञाता करता अर्जुन ।
‘ज्ञाता’ अरु ‘ज्ञेय’ एक होते, दोनों को जोड़े मार्ग ‘ज्ञान’,
सीमा बन रहे ‘ज्ञेय’: जिसकी अरु ‘ज्ञान’ जहाँ तक धायमान ।
देता पदार्थ को नाम अलग, विस्तार जगत का करता है,
यह ‘ज्ञान’पदार्थो से जग के जीवन को भरता चलता है।
अब सुनो ‘ज्ञेय’ के लक्षण क्या, विषयों के पाँच भेद होते,
वे शब्द परस रस रुप गन्ध, जिनको हैं ज्ञेय विषय कहते ।
है ‘ज्ञेयःएक ही वस्तु किन्तु इन्द्रिय से ‘ज्ञान’ अलग होता,
शब्दादि गुणों के कारण उसका अनुभव अलग-अलग होता।
ज्यों ‘आम’इन्द्रियों को विभिन्न, अपना रस भोग कराता है,
सुनने का करता काम कान, रसना पर रस आ जाता है।
रंग उसका नेत्र देखते हैं, नासिका गन्ध से भर जाती,
अरु त्वचा परस का बोध करे, हर इन्द्रिय सुख अपना पाती । क्रमशः….