‘गीता ज्ञान प्रभा ‘ धारावाहिक 225..

मध्य प्रदेश के नरसिंगपुर जिले की माटी के मूर्धन्य साहित्यकार स्वर्गीय डॉक्टर रमेश कुमार बुधौलिया जी द्वारा रचित ‘गीताज्ञानप्रभा’ ग्रंथ एक अमूल्य ,धार्मिक साहित्यिक धरोहर है, जिसमे डॉक्टर साहब द्वारा ज्ञानेश्वरीजी महाराज रचित ज्ञानेश्वरी गीता का भावानुवाद किया है, श्रीमद्भगवतगीता के 700 संस्कृत श्लोकों को गीता ज्ञान प्रभा में 2868 विलक्ष्ण छंदों में समेटा गया है।
उन्ही के द्वारा श्रीमद्भगवतगीता महाकाव्य की छंदोंमयी श्रंखला ‘गीता ज्ञान प्रभा‘ धारावाहिक की 225 वी कड़ी..                      अष्टादशोऽध्यायः- ‘मोक्ष सन्यास योग’

‘निष्कर्ष योग’ समस्त अध्यायों का सार संग्रह । मोक्ष के उपायभूत सांख्ययोग (सन्यास) कर्मयोग (त्याग) का अंग प्रत्यंगों सहित वर्णन ।

श्लोक  (१७)

प्रेरित न दम्भ से जो अर्जुन, जिसकी न बुद्धि रे मलिन रही,

वह चाहे जो भी कार्य करे, पर उसकी गति न कभी बिगड़ी।

करके संहार सकल जग का, वह नहीं किसी को मार रहा,

संहार कृत्य अति क्रूर मगर, वह कर्म बन्ध के पार रहा ।

 

रे मुक्त मनुज जो कर्म करे, वह मुक्त अहम् से रहता है,

उपकरण बना विश्वात्मा का, वह कार्य समूचे करता है।

इसलिए कि विश्व व्यवस्था को, उसको ही साधे रखना है,

करणीय कर्म उसको अपने, निस्वार्थ भाव से करना है।

 

आदिष्ट रहे कर्तव्य उसे, उसमें न रही उसकी इच्छा,

अतिक्रूर कर्म करके भी रे, वह मुक्त कर्म फल से रहता ।

संहार दूसरों का करके, भी नहीं किसी को मार रहा,

उसमें न कर्म का, किन्तु भावना का केवल महत्व उभरा

 

आत्मिक जीवन यापन करता, जुड़ गया चेतना से विशाल,

वह पाप नहीं करता कोई, उसमें परमात्मा का निवास ।

उससे न पाप हो सकता है, होंगे जो होंगे सही काम,

वह लौकिक नहीं पालता है, परमात्मा का दैवी विधान ।

 

इसका यह आशय नहीं कि मुक्ति का अधिकारी है अपराधी,

मुक्तात्मा की यह बात रही, उसकी लीला न्यारी सारी ।

संपर्क अग्नि का पाकर ज्यों, हो जाती अग्नि स्वरुप वस्तु,

दाहक आत्मा अरु दाहय कर्म, बन रह जाते हैं एक वस्तु ।

 

‘मैं कर्त्ता हूँ ‘अन्तस में जिसके, भाव नहीं ऐसा रहता,

जो नहीं पदार्थ या कर्मो में, अलिप्त बुद्धि अपनी रखता ।

वह पुरुष हनन कर लोकों का, भी हनन नहीं कुछ भी करता,

कर्मो का कर्त्ता बने न वह, उसको न कर्म बन्धन बनता ।

 

ईश्वर जग की उत्पत्ति करे, ईश्वर करता जग का पालन,

ईश्वर जग का संहार करे, फल किन्तु नहीं करता धारण ।

हो अंतःकरण शुद्ध सात्विक, ममता आसक्ति रहित मति हो,

उससे न कपट हिंसा होती, उसकी न सुगति या अवगति हो ।

 

यह आत्मा का अकर्त्तापन, समझाये सांगोपांग कर्म,

यह रहा मनुज को जीवन में, धारण करने के योग्य मर्म ।

प्रेरक होते हैं कौन तत्व, क्या रहा कर्म संग्रह अर्जुन,

वह ज्ञान-कर्म बतलाता हूँ, एकाग्र चित्त से उसको सुन । क्रमशः….