‘गीता ज्ञान प्रभा ‘ धारावाहिक 224..

मध्य प्रदेश के नरसिंगपुर जिले की माटी के मूर्धन्य साहित्यकार स्वर्गीय डॉक्टर रमेश कुमार बुधौलिया जी द्वारा रचित ‘गीताज्ञानप्रभा’ ग्रंथ एक अमूल्य ,धार्मिक साहित्यिक धरोहर है, जिसमे डॉक्टर साहब द्वारा ज्ञानेश्वरीजी महाराज रचित ज्ञानेश्वरी गीता का भावानुवाद किया है, श्रीमद्भगवतगीता के 700 संस्कृत श्लोकों को गीता ज्ञान प्रभा में 2868 विलक्ष्ण छंदों में समेटा गया है।
उन्ही के द्वारा श्रीमद्भगवतगीता महाकाव्य की छंदोंमयी श्रंखला ‘गीता ज्ञान प्रभा‘ धारावाहिक की 224 वी कड़ी..                      अष्टादशोऽध्यायः- ‘मोक्ष सन्यास योग’

‘निष्कर्ष योग’ समस्त अध्यायों का सार संग्रह । मोक्ष के उपायभूत सांख्ययोग (सन्यास) कर्मयोग (त्याग) का अंग प्रत्यंगों सहित वर्णन ।

श्लोक  (१५)

हो कर्म उचित या अनुचित हो, जिसको मनुष्य करना चाहे,

तन से मन से या वाणी से, सम्पन्न जिसे करना चाहे ।

जब तक न हेतु कारण जुड़ते, वह नहीं पूर्ण करने पाता,

हर कार्य न पूरा हो पाता, यदि हेतु नहीं सधने पाता ।

 

कायिक हो, वाचिक या मानसिक, शुभ अशुभ कर्म सारे जग के,

सम्पन्न तभी हो पाते हैं, जब ये पाँचों कारण जुड़ते ।

कोई भी एक रहा कम तो, सम्पन्न नहीं वह हो पाता,

मन का संकल्प समाहित कर, पाँचों को कर्म करा पाता

 

होते हैं कुछ बावन अक्षर, इतनी ही रही वर्णमाला,

सारे मन्त्रों के अक्षर पर, सीमित कर रही वर्णमाला ।

कोई न मन्त्र का अक्षर यों, जो अलग वर्णमाला से हो,

पर विधि विधान का ज्ञान न हो, मन्त्र नहीं सधता उसको ।

 

जो पाँच रहे कारण अर्जुन, उनके ही होते पाँच हेतु,

उन दो के बीच झमेले में, आत्मा का बनता रहे सेतु ।

ज्यों सूर्य विषय न होकर भी, नेत्रेन्द्रिय का माध्यम बनता,

नेत्रेन्द्रिय की वह ज्योति बने, उसका ही वह प्रकाश बनता ।

 

दर्पण में देख रहा मुँह जो, वह दर्पण नहीं, अलग उससे,

प्रतिबिम्ब नहीं वह, अलग रहा, पर हेतु सिद्ध होता उससे ।

दिन है, न रात है, सूर्य, पार्थ, पर कारण उनका सूर्य रहा,

रहता अलिप्त सूरज जैसा, रे अधिष्ठान में आत्म रहा ।

श्लोक  (१६)

पर विकृत मन वाला मनुष्य, वह एकमेव बनता कर्त्ता,

अकुशल सहयोग बुद्धि का ले, वह मूल बात ओझल करता।

वह रहा पाँच के बीच एक, इसको वह झुठला देता है,

उपकरण बने उसको कारण, यह गलती अपना लेता है ।

 

आरोप करे कर्त्तापन का, आत्मा पर जो निर्लिप्त रहे,

सच को वह देखने पाता है, वह दृष्टि न उसके पास रहे ।

कर्ता न जीव भी हो पाता, वह उपज प्रकृति की, उपादान,

पहिचान अहम् की हो जिसको, होता है उसको सही ज्ञान।

 

हे पार्थ अशुद्ध बुद्धि धारी, देता न हेतु की ओर ध्यान,

कर्ता कर्मो का बन जाता, ले लेता स्वयं हेतु स्थान ।

झुठलाता रहता सच्चाई, सचमुच होता वह अज्ञानी,

कारण, निमित्त या उपादान, उनकी न बात उसने मानी ।

 

उसको न ज्ञात रहता यथार्थ, वह मलिनबुद्धि, वह अज्ञानी,

सब कर्म प्रकृति की उपज रहे, यह बात नहीं उसने जानी ।

विश्वात्मा का ही वृहत ज्ञान, जिसमें जग-जीवन का यापन,

वह रहे देह में ही भूला, कर पाता नहीं आत्म दर्शन । क्रमशः….