रचित ‘गीताज्ञानप्रभा’ ग्रंथ एक अमूल्य ,धार्मिक साहित्यिक धरोहर है, जिसमे डॉक्टर साहब द्वारा ज्ञानेश्वरीजी महाराज रचित ज्ञानेश्वरी गीता का भावानुवाद किया है, श्रीमद्भगवतगीता के 700 संस्कृत श्लोकों को गीता ज्ञान प्रभा में 2868 विलक्ष्ण छंदों में समेटा गया है।अध्याय अठारह – ‘निष्कर्ष योग’ समस्त अध्यायों का सार संग्रह । मोक्ष के उपायभूत सांख्ययोग (सन्यास) कर्मयोग (त्याग) का अंग प्रत्यंगों सहित वर्णन ।
श्लोक (९)
पर हे अर्जुन सिंह साधक ने कर्त्तापन का अभिमान तजा,
कर्तव्य समझकर कर्म किया, अरु फल का मोह विचार तजा ।
वह कर्मगुणों से हो असंग, कर रहा कर्म, पर है त्यागी,
यह सात्विक त्याग रहा उसका, वह दिव्य कर्म का अनुरागी।
कर्तव्य भाव के मिटने पर, मिट जाता दोष तमोगुण का,
इच्छा न कर्मफल की रहती, मिट जाता दोष रजोगुण का।
विस्तार सतोगुण का होता, आँखें भीतर की खुल जातीं,
खिल रहे ज्योत्सना मृगजल की, लहरें फिर दृष्टि नहीं आती।
श्लोक (१०)
दुखदायी कर्मो से अर्जुन, जो पुरुष न रखता द्वेष कभी,
सुखदायी कर्मो में उसकी, हे पार्थ नहीं आसक्ति रही ।
सतगुण में सुस्थित रहता जो, सुस्थिर मति जो निज कर्म करे
, उसके मन में न कर्म-विषयक, संशय कोई कदापि उपजे ।
मतिमन्त पुरुष जो करे त्याग, जिसके संशय सब दूर हुए,
जिसने स्वभाव सात्विक पाया, जिसने कल्मष सब दूर किए।
उसको न अप्रिय-प्रिय का दुराव, उसको न अप्रिय से घृणा रहे,
जो कर्म प्रीतिकर होते है, उनसे न उसे अनुराग रहे ।
जन्मानुसार जो कर्म मिले, वे अच्छे बुरे कहाते हैं,
सात्विक त्यागी पुरुषों द्वारा, इस तरह न देखे जाते हैं।
निर्मल मति उनकी रहती है, निर्मल सब कर्म उन्हें दिखते,
गुण-दोष लुप्त हो जाते हैं, बस कर्म, कर्म बनकर रहते ।
जो पुरुष कर्म का कर्ता”मैं’यह भाव नहीं रखता मन में,
करता है त्याग, त्याग उसका, सात्विक होता है जीवन में ।
यह त्याग वास्तविक त्याग रहा, इससे हटकर कुछ त्याग नहीं,
हटकर जो त्याग किए जाते, बन्धन कारक वे रहे सभी । क्रमशः….