रचित ‘गीताज्ञानप्रभा’ ग्रंथ एक अमूल्य ,धार्मिक साहित्यिक धरोहर है, जिसमे डॉक्टर साहब द्वारा ज्ञानेश्वरीजी महाराज रचित ज्ञानेश्वरी गीता का भावानुवाद किया है, श्रीमद्भगवतगीता के 700 संस्कृत श्लोकों को गीता ज्ञान प्रभा में 2868 विलक्ष्ण छंदों में समेटा गया है।एकादशोऽध्यायः ‘विश्व रूप दर्शन योग’
अध्याय ग्यारह – ‘भगवान का दिव्य रूपान्तर’
श्लोक (३२-३३-३४)
श्री भगवानुवाच:-
जो लोकों का करने विनाश, उद्यत, मैं वह हूँ महाकाल,
इस समय प्रवृत्त हूँ मैं अर्जुन, करने विनाश होकर कराल ।
अतिरिक्त पाण्डवों के रण में, दोनों पक्षों के योद्धागण,
पायेंगे मृत्यु अवश्यमेव, तू युद्ध करे या तज दे रण ।
लोकों का करता जो विनाश, अर्जुन वह महाकाल हूँ मैं,
हो गया बड़ा बढ़कर इतना, कर रहा दमन लोकों का मैं ।
कटने-मरने सेनाओं के, योद्धा जो खड़े हुए रण में,
तू युद्ध करे या नहीं करे, कोई न शेष होंगे रण में
मैं हूँ प्रवाह अविराम चलूँ, मैं चलूँ मिटाऊँ लोकों को,
यह विश्व रहा मेरी रचना, कुछ भी अच्छा न बुरा मुझको ।
अस्तित्व मर्त्य मेरे कारण, सुख-दुख अथवा हो जन्म मरण,
उत्तरदायी मैं स्वयं रहा, हो सृजन कार्य या मृत्युवरण ।
परमात्मा की आज्ञा मानू, मैं रहूँ नियंत्रण में उसके,
जो रहते हैं जुड़कर उससे, उन पर न दाँव मेरे चलते ।
अर्जुन कर्मो की गति अपनी, परिणाम सहित चलते हैं वे,
स्वाभाविक क्रम चलते रहते, रुक सकें नहीं घटते हैं वे ।
पहिले ही हुआ सुनिश्चित यह, दुश्मन सब मारे जायेंगे,
परिणाम भोगना ही होगा, कोई न शेष बच पायेंगे हो रहा,
स्वयं तू देख रहा, इस अटल नियम का परिपालन,
रहता न भूत अथवा भविष्य, मैं वर्तमान का अधिकारण ।
मेरा इस समय प्रयास यही, इन सब लोगों का हो विनाश,
जो तूने देखा है मुख में, जो दिखलाया मैंने विराट ।
मन में तेरे कायरता का, जो भाव, देख रण आया था,
जब आत्मीय स्वजनों को तूने, रण में लड़ने पाया था ।
तुम युद्ध छोड़ना चाह रहे, तुम चाह रहे इससे हटना,
यह घटना तो घट चुकी पार्थ, यह है तुमको केवल पढ़ना ।
तुम चाहे युद्ध करो न करो, परिणाम युद्ध का घटना है,
आज्ञा तुमकों मेरी अर्जुन, तुमको न युद्ध से हटना है
यह शत्रुपक्ष है मरा हुआ, तुमको न मारना है इसको,
कुछ नहीं परिश्रम करना है, वरने को श्रेय खड़ा तुमको ।
नाते रिश्ते सब झूठे हैं, झूठा है सब जग का प्रपंच,
कायर मत बन, गाण्डीव उठा, कर अरिदल का समूल अन्त ।
तुझको न लगेगा पाप पार्थ, तू मात्र निमित्त बनेगा रे,
तू क्षात्र धर्म का पालन कर, कौरव कुल आप मरेगा रे ।
मत कोई संशय ला मन में, तज अहंकार, तज ममता को,
उत्साह सहित रण में बढ़, तू कोई न मिलेगा समता को ।
सेना चतुरंग सजाकर जो, प्रतिद्वन्द्वी रोपा करते रण,
होकर घमण्ड में चूर, पराक्रम का अपने करते गायन ।
दिखलाते अपनी वीर वृत्ति, दर्पित, यम को ओछा कहते,
उनको खुद अपना पता नहीं, सर्वज्ञ बने जग में रहते ।
कहते हैं नई सृष्टि रचना, निर्माण नया करना उनको,
संघर्ष अंत तक करना है, करना है विजित मृत्यु उनको ।
सारी पृथ्वी निगलेंगे वे, आकाश समेट जला देंगे,
शस्त्रों से तीखे बोलों से, वे सारा जग दहला देंगे ।
लेकिन ये सब बुलबुले रहे, गन्धर्व नगर ज्यों बादल के,
या रहे खोखले पिण्ड मात्र, या कोरे चित्र बने फूल के ।
यह सारी सेना एक साँप, जो है कपड़े का बना हुआ,
या अलंकार उस गुड़िया का, जिसमें हो भूसा भरा हुआ
संचालित करती क्रिया को, वह शक्ति छीन ली पहिले ही,
ग्रस लिए प्राण योद्धाओं के, करतब रचने के पहिले ही ।
यह सारी सेना कठपुतली, गुड़ियों जैसी निर्जीव रही,
जो डोर चलाती है उसको, वह डोर टूटकर दूर पड़ी ।
अतएव सव्यसाची अर्जुन, उठ और युद्ध का निश्चय कर,
संहार शत्रुओं का कर तू, अरु विजय, राज्यश्री यश को वर ।
मेरे द्वारा पहिले से ही, हो चुका हनन सब वीरों का,
तू केवल बन निमित्त इसका, कौशल दिखला दे तीरों का ।
उठ अर्जुन यश को अर्जित कर, पा विजय शत्रुओं पर अयास,
कर भोग राज्यश्री का असीम, धन-धान्य पूर्ण सम्पन्न राज ।
सब शूरवीर पहिले से ही, मेरे द्वारा पा चुके मरण,
बन जा निमित्त केवल अब तू, हे वीर धनुर्धर सव्य सचिन ।
कर युद्ध निशंक अभय होकर, मत द्रोण भीष्म की कर चिन्ता,
कर्णादि जयद्रथ महारथी, इन सबका हूँ मैं ही हन्ता ।
मैं मार चुका इनको पहिले, मन में रंचक सन्देह न कर
ज जीतेगा युद्ध बैरियों से, उठ अर्जुन युद्ध-विजयश्री वर ।
पारंगत युद्ध कला में वे, अस्त्रों, शस्त्रों में रहे निपुण,
वे हैं अजेय, वरदान प्राप्त, हाथों में रहता उनके रण ।
उनका वध करना पापकर्म, इसलिए न लड़ना चाह रहा,
तो अर्जुन सत्य समझ ले तू, यह मन का सब भ्रमजाल रहा।
गुरुद्रोण, पितामह भीष्म, कर्ण, जयद्रथ समेत अन्यान्य वीर,
मैं मार चुका इनको पहिले, जिनके विचार से तू अधीर ।
इन शूरवीर योद्धाओं को, जो मरे हुए तू मार पार्थ,
भयभीत न हो, सन्देह न कर, तू जीतेगा यह युद्ध पार्थ ।
श्लोक (३५)
संजय उवाच :-
भगवान कृष्ण ने हे राजन, अर्जुन से कहा कि युद्ध करो,
रण में विजयी तुम ही होगे, शंका न करो मन में न डरो।
कम्पित शरीर भयभीत हृदय, अर्जुन करके पुनि पुनि प्रणाम,
कर जोड़ गदगद वाणी से, बोला, केशव, हे सुख निधान । क्रमशः…