सतपुड़ा के शिखरों पर गूंजता ‘शिव-सायुज्य’..

महाशिवरात्रि विशेषांक ..जहाँ आस्था, बादलों का सीना चीरकर मोक्ष तलाशती है ..

सतपुड़ा की कंदराओं और शिखरों पर रची-बसी आस्था, प्रकृति और तपस्या की इस महागाथा को एक विस्तृत साहित्यिक स्वरूप में यहाँ प्रस्तुत किया जा रहा है। यह लेख पाठकों को मानसिक रूप से उस दुर्गम पथ का यात्री बना देगा, जहाँ हर कदम ‘शिवत्व’ की ओर बढ़ता है..

✍️ राकेश प्रजापति

मध्य भारत का हृदय स्पंदन ‘सतपुड़ा’ इन दिनों सामान्य पर्वत श्रृंखला नहीं रहा। यह शिवत्व में विलीन हो चुकी एक ऐसी ‘तपोभूमि’ बन गया है, जहाँ हवाओं में ऑक्सीजन से ज़्यादा ‘हर-हर महादेव’ का जयघोष घुला हुआ है। जब पचमढ़ी की नीरव शांति को लाखों भक्तों के ‘बम-बम भोले’ के स्वर भेदते हैं, तो ऐसा प्रतीत होता है मानो स्वयं कैलाश उतरकर विंध्य और सतपुड़ा की गोद में आ विराजे हों।

यह कथा केवल एक मेले की नहीं, यह कथा है—अनंत थकान पर अजेय आस्था की विजय की।

यात्रा का शंखनाद और पौराणिक भूमि का स्पर्श 

सतपुड़ा की वादियों में ‘हर-हर महादेव’ की मधुर गूंज प्रतिध्वनित होने लगी है। महाशिवरात्रि के पावन पर्व पर महादेव मेले की विधिवत शुरुआत 5 फरवरी से हो चुकी है। आस-पास के जिलों—छिंदवाड़ा, बैतूल, होशंगाबाद—से लेकर सुदूर महाराष्ट्र तक के शिवभक्तों का रेला इस दुर्गम पथ पर उमड़ पड़ा है।

भस्मासुर और शिव का लुका-छिपी का खेल: इस मेले की नींव उस पौराणिक कथा पर टिकी है जो कहती है कि जब भस्मासुर से अपनी रक्षा के लिए भगवान शंकर पर्वत पर पहुंचे थे, तब उन्होंने जुन्नारदेव स्थित ‘पहली पायरी’ में अपना एक पैर रखा था। तब से यह स्थान धार्मिक स्थल ‘पहली पायरी’ के नाम से प्रसिद्ध है। यहाँ पत्थर पर उकेरी गई महादेव शंकर और माता पार्वती की प्रतिमा आज भी उस घटना की साक्षी है। इसी पहली पायरी से प्रसिद्ध महादेव यात्रा की शुरुआत होती है, जिसे महादेव यात्रा की पहली सीढ़ी माना जाता है।

प्रस्थान बिंदु: जुन्नारदेव – जहाँ ‘नटराज’ ने धरा था प्रथम पग

जुन्नारदेव रेलवे स्टेशन से मात्र 3 किमी की दूरी पर स्थित ‘पहली पायरी’ इस महायात्रा का प्रवेश द्वार है।

अखंड जलधारा का चमत्कार: यहाँ महादेव की कृपा से एक पवित्र झरने नुमा कुंड से बारह महीने अनवरत शुद्ध पानी बहता रहता है। विज्ञान के लिए यह एक पहेली हो सकती है, किन्तु भक्तों के लिए यह साक्षात शिव की जटाओं से गिरता आशीर्वाद है। मान्यता है कि इस पानी से नहाने से चर्म रोग जैसी बीमारियों से राहत भी मिलती है।

संकल्प और कपूर की सुगंध: शिवभक्त इस कुंड में नहाने के बाद प्राचीन महादेव मंदिर में जल चढ़ाते हैं। वहीं, पहली पायरी में कपूर जलाने के बाद महादेव पर्वत की पैदल यात्रा शुरू करते हैं।

सतधारा: प्रकृति का वैदकीय स्पर्श

पहली पायरी से पैदल यात्रा शुरू करने वाले शिवभक्त ‘पदमू पठार’ के पर्वत को पार कर लगभग 8 किमी की पैदल यात्रा तय कर ‘सतधारा’ पहुँचते हैं।

लकवे का उपचार: सतधारा का जल केवल प्यास नहीं बुझाता, बल्कि आरोग्य प्रदान करता है। यह स्थान लकवे की बीमारी के उपचार के लिए प्रसिद्ध है।

सात कुंडों का रहस्य: यहाँ चट्टाननुमा पत्थर पर सात कुंड बने हुए हैं, जिन्हें ‘सतधारा’ कहा जाता है। इसे महादेव यात्रा का पहला पड़ाव माना जाता है। यहाँ शिवभक्त भोजन तैयार करते हैं और रात्रि विश्राम के बाद आगे की चढ़ाई के लिए ऊर्जा संचित करते हैं।

नंदीखेड़ा और दुर्गम चढ़ाई का आरंभ

सतधारा से 5 किमी की दूरी पर ‘नागधाना’ है, और वहाँ से आगे बढ़ने पर ‘नंदीखेड़ा’ (या दनवा नदी का क्षेत्र) आता है।

भूराभगत का मार्ग: भूराभगत से लगभग 7 किमी दूरी पर बड़ी भुवन स्थित है, जहाँ देनवा नदी में शिवभक्त स्नान करते हैं। यहाँ से मात्र 3 किमी की दूरी पर ‘नंदीग्राम’ है, जहाँ से लगभग एक किमी दूरी पर स्थित ‘पहली पायरी’ है (यह संदर्भ भूराभगत की ओर जाने वाले मार्ग का है)। यहीं से चौरागढ़ की कठिन चढ़ाई शुरू होती है।

चुनौतीपूर्ण पथ: लगभग 7 किमी की कठिन चढ़ाई चढ़ने के बाद ही शिवभक्त चौरागढ़ पर्वत पर स्थित महादेव मंदिर पहुँचते हैं।

भूराभगत: भक्ति की पराकाष्ठा और होलिका दहन

सतधारा से नग्नपाँव होते हुए शिवभक्त 12 किमी पैदल सफर तय कर ‘भूराभगत’ पहुँचते हैं।

भक्त की महिमा: संत भूराभगत महादेव शंकर के परम भक्त थे। इस देव स्थान पर स्थित पत्थरनुमा स्तम्भ को उनका प्रतिबिंब माना जाता है। जिनके पूजन के बाद शिवभक्त उसका स्पर्श कर उसे दबाते हैं, जिससे यात्रा की थकान दूर होती है।

अनिवार्य दर्शन: ऐसी मान्यता है कि भूराभगत के दर्शन के बाद ही चौरागढ़ पर्वत पर महादेव शंकर के दर्शन शिवभक्त करते हैं। भूराभगत के दर्शन किए बिना महादेव यात्रा अधूरी मानी जाती है।

शिवरात्रि की दूसरी रात का उत्सव: भूराभगत में आज भी एक अनोखी परंपरा जीवित है। शिवभक्तों ने चौरागढ़ और भूराभगत में शिवरात्रि की दूसरी रात होली मनाना तय किया। आज भी यहाँ नारियल, उसके ढक्कन (चक्कू) और बुच की होली जलाई जाती है। इसके बाद भगवान शिव और उनके भक्त भूराभगत को होली की राख (भस्म) का तिलक और टेसू-पलाश के फूल का रंग लगाकर यात्री अपने घर वापस होते हैं।

 चौरागढ़: बादलों के पार, त्रिशूलों का अंबार

और अंत में आता है वह शिखर, जो बादलों से बातें करता है—चौरागढ़। यहाँ पहुँचकर ‘अहम्’ पूरी तरह ‘ब्रह्म’ में लीन हो जाता है।

त्रिशूल चढ़ाने की परंपरा: महादेव यात्रा में शंकर के प्रिय शस्त्र ‘त्रिशूल’ को चढ़ाने की अनूठी परंपरा है। शिवभक्त मन्नत पूरी होने पर यहाँ त्रिशूल चढ़ाते हैं। नागपुर के कामठी से आए शिवभक्त केदार सुतार का कहना है कि वह अपने बीस साथियों के साथ लगभग 51 किलो वजनी लोहे का त्रिशूल लेकर चौरागढ़ जा रहे हैं।

बाना छोड़ गए शिव: धार्मिक मान्यताओं अनुसार, भगवान शिव से भक्त भस्मासुर ने वरदान पाकर उन्हें ही भस्म करना चाहा, जिससे बचकर शिव सतपुड़ा की विशाल पर्वतमाला में आकर छिप गए। जब वे वापस गए तो अपना त्रिशूल-शिवबाना छोड़ गए। भक्तजन इस धार्मिक स्थल पर अपने आराध्य देव को विभिन्न धातुओं, रूप और आकार के त्रिशूल अर्पित करते हैं।

मनोकामना पूर्ति: यहाँ महादेव शंकर की प्रतिमा के दर्शन करने मात्र से सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं, और यात्रा की सारी थकान पल भर में दूर हो जाती है।

संस्कृति का महाकुंभ: जहाँ मृत्यु भी उत्सव है

इस यात्रा के मार्ग में आपको जगह-जगह समाधियाँ मिलेंगी। लगभग 52 किमी लंबे यात्रा मार्ग पर हर जगह समाधियाँ मौजूद हैं, जिनके सहारे यात्री अपने यात्रा पथ पर बढ़ते हैं। इनमें लगभग 90 फीसदी समाधियाँ महाराष्ट्र से आए भक्तों की हैं, जिनकी मृत्यु होने पर भक्तों और परिजनों द्वारा वहीं समाधि बना दी गई। यह बताता है कि इस पथ पर देह त्यागना भी भक्तों के लिए मोक्ष प्राप्ति समान है।

मराठी संस्कृति की गूंज: पूरे रास्ते मराठी संस्कृति, ‘लावणी’, ‘पोवाड़े’, नाट्य संगीत सहित मराठी भाषी संगीत गाते हुए शिवभक्त यात्रा करते हैं। डपली, बाजा, टिमकी, शंख और मंजीरे जैसे वाद्य यंत्र इस संगीत को और भी मधुर बना देते हैं, जिससे माहौल शिवमय हो जाता है।

 सेवा और स्वाद: भंडारे की व्यवस्था

महादेव मेला मार्ग पर जगह-जगह भंडारे की व्यवस्था है। लगभग 80 समितियां भंडारे का आयोजन करती हैं, जिनमें 90 फीसदी भंडारा महाराष्ट्र की समितियों ने लगाए हैं। यहाँ मक्के की रोटी, चावल के पापड़, पोपट, बरबटी के दाने, छाछ और नींबू पानी की दुकानें ग्रामीणों ने सजा रखी हैं, जिनका लुत्फ शिवभक्त उठाते हैं।

पचमढ़ी से 89 किमी और छिंदवाड़ा से जुन्नारदेव के रास्ते शुरू होने वाली यह यात्रा, मध्य भारत की धार्मिक आस्था का मेरुदंड है। यदि आप चाहते हैं कि आपके रोम-रोम में ऊर्जा का संचार हो, और आप प्रकृति के रौद्र किन्तु सौम्य रूप का दर्शन करना चाहते हैं, तो सतपुड़ा आपको पुकार रहा है।

“चलो, कि पहाड़ बुला रहे हैं… चलो, कि महादेव राह देख रहे हैं !”

(‘शिव-सायुज्य’ (Shiv-Sayujya) एक अत्यंत गहरा आध्यात्मिक शब्द है। भारतीय दर्शन (वेदांत और शैव मत) में ‘सायुज्य’ मुक्ति का वह सर्वोच्च स्तर है जहाँ आत्मा, परमात्मा (शिव) में पूरी तरह विलीन होकर ‘एक’ हो जाती है)