नेताओं की जुबान ने किया समाज को लहूलुहान

राजनीति के शोर में डूबी संवेदनाओं की आवाज़…

सौसर में ‘माफी मांगो’ के नारों के बीच गरजी तल्ख़ सियासत, नेताओं की जुबान ने किया समाज को लहूलुहान

  1. त्वरित टिप्पणी : राकेश प्रजापति 

सौसरराजनीति कभी समाज को दिशा देने का माध्यम थी… पर आज वही राजनीति समाज के बीच दीवारें खड़ी करने का ज़रिया बनती जा रही है।

पांढुर्णा में किसान आंदोलन जैसे अत्यंत संवेदनशील मंच से विधायक विजय रेवनाथ चौरे द्वारा दिए गए अमर्यादित और विवादित बयान ने सिर्फ राजनीति में तूफान नहीं खड़ा किया, बल्कि सामाजिक समरसता की आत्मा को भी झकझोर दिया। इसी के विरोध में सौसर में भारतीय जनता पार्टी की ओर से उग्र विरोध, सभा और रैली ने माहौल और भी गरमा दिया—और फिर गूंज उठे नारे… “माफी मांगो… माफी मांगो…”

लेकिन सोचने वाली बात यह है—क्या यह सिर्फ राजनीतिक विरोध है? या हमारी गिरती संवेदनाओं का आईना ?

राजनीति अब ध्येय नहीं, ‘दिखावे और द्वेष’ का माध्यम बनती जा रही है

सभा में नेताओं ने तीखे प्रहार किए, आरोप-प्रत्यारोप हुए, भाषण गरजे… मंच कांप गया, जनता का आक्रोश उबल पड़ा। पर इस तूफ़ान के बीच कहीं लोकतंत्र की गरिमा कराह रही थी। वक्ताओं ने कहा कि विधायक का बयान सिर्फ भाजपा नहीं, बल्कि सभ्य समाज और लोकतांत्रिक मर्यादा पर वार है। नेताओं ने चेतावनी दी कि माफी नहीं तो उग्र आंदोलन होगा।

लेकिन सच यह भी है कि यह राजनीति अब मुद्दों से भटक रही है। किसान, विकास, शिक्षा, बेरोजगारी, बुनियादी सुविधाएं—इन सब मुद्दों को पीछे छोड़कर राजनीतिक द्वेष की चिंगारियां भड़काई जा रही हैं। जुबानें तलवार बनती जा रही हैं और सियासत ‘सेवा’ से हटकर ‘स्वार्थ’ का खेल बनती जा रही है।

जब नेता शब्दों से नहीं, जहर से बोलने लगें…

नेताओं का गरमाया हुआ अंदाज़, तंज, कटाक्ष और तीखी भाषा—यह सिर्फ विपक्ष पर हमला नहीं, बल्कि समाज की शांति पर भी कुठाराघात है। पूर्व नेताओं की मर्यादा और संयम की मिसालें आज धुंधली होने लगी हैं।

आज के नेता भूल रहे हैं कि जनता सिर्फ नारों से नहीं, जिम्मेदारी और गरिमा से प्रभावित होती है। लेकिन यहां मंचों से मर्यादा टूट रही है, भाषा गिर रही है, राजनीति जहरीली होती जा रही है।

आंदोलन की आड़ में ‘अहंकार’ का प्रदर्शन…

रैली, प्रदर्शन, नारेबाजी… पुतला दहन… पुलिस से तनातनी… यह लोकतांत्रिक अधिकार है, पर जब यह सीमाएं लांघने लगे और समाज में तनाव घोलने लगे, तब यह अधिकार नहीं, अराजकता की आहट बन जाता है।

भाजपा नेताओं ने विधायक के खिलाफ कानूनी कार्रवाई और स्वेच्छानुदान घोटाले की जांच की मांग तो की, पर इसी राजनीति की आग में सामान्य जनता जल रही है—यह दर्द कोई नहीं देख रहा।

आवश्यक है—राजनीति में ‘आत्मा’ का पुनर्जागरण

आज राजनीति को जरूरत है—

• भाषा में मर्यादा

• मन में संवेदना

• समाज के प्रति उत्तरदायित्व

• और सत्ता के बजाय सेवा का भाव

यदि नेता अपनी जुबान को बेकाबू रखेंगे, तो समाज में जहर घुलेगा, विभाजन बढ़ेगा और लोकतंत्र कमजोर होगा। यह संघर्ष सिर्फ दो दलों का नहीं, राजनीतिक चरित्र बनाम राजनीतिक पतन का है।

सीधा सवाल — जनता के नाम

क्या राजनीति ऐसे ही चलेगी ?

क्या मंच गाली और नफरत के पर्याय बनते रहेंगे?

क्या जनता सिर्फ ताली बजाएगी या जवाब मांगेगी?

आज वक्त है कि जनता सवाल पूछे— नेता चुनाव जीतने आए हैं या समाज को तोड़ने ?

जनता के बीच आग लगाने आए हैं या प्रकाश देने ?

अंतिम संदेश : सौसर की यह घटना सिर्फ राजनीतिक टकराव नहीं, बल्कि लोकतंत्र की चेतावनी है। राजनीतिक दलों को यह समझना होगा—मर्यादा से बड़ी कोई राजनीति नहीं, और समाज से बड़ा कोई दल नहीं।

यदि राजनीति को बचाना है, तो पहले राजनीतिक आत्मा को बचाना होगा—वरना सत्ता मिलेगी, पर सम्मान खो जाएगा… और इतिहास इसे सिर्फ ‘कटु भाषा और कटु राजनीति के काले अध्याय’ के रूप में याद करेगा।