विशेष रिपोर्ट:…
व्यवस्था की बहरापन और ‘कागजी इंसाफ’ का ढोंग – जब हलधर की आंखों में उतरा प्रशासनिक अंधेरा..
त्वरित टिप्पणी : राकेश प्रजापति
छिंदवाड़ा// लोकतंत्र में जनसुनवाई और शिकायतों के अंबार को अक्सर ‘समाधान’ की पहली सीढ़ी माना जाता है, लेकिन सांवरी तहसील के ग्राम सोनमऊ की मिट्टी आज प्रशासनिक विफलता की गवाही दे रही है। यह मामला सिर्फ एक किसान विनोद लाडे की 3 एकड़ बर्बाद फसल का नहीं है, बल्कि यह उस तंत्र के खोखलेपन का जीवंत प्रमाण है जो शिकायतों की फाइलें तो मोटी करता है, लेकिन समाधान के नाम पर ‘शून्य’ है।
जनसंपर्क की ओट में सच का गला घोंटने की कोशिश..
जब सिस्टम अपनी नाकामियों को छिपाने में असमर्थ होता है, तो वह सबसे पहले ‘खंडन’ का सहारा लेता है। इस मामले में भी यही हुआ ,एक समाचार पत्र में प्रकाशित खबर पर जल संसाधन विभाग की कार्यपालनयंत्री ने जनसंपर्क विभाग को हथियार बनाकर अपनी तकनीकी खामियों को सुधारने के बजाय अपनी पूरी ऊर्जा खबर को ‘झूठा’ और ‘आधारहीन’ बताने में झोंक दी।
प्रशासनिक विडंबना: पटवारी की रिपोर्ट चीख-चीख कर कह रही है कि जल रिसाव से खेत दलदल बन चुका है, किसान का शपथ पत्र सच्चाई बयां कर रहा है, लेकिन विभाग का ‘अहंकार ‘ इतना बड़ा है कि वह जनसंपर्क विभाग के पीछे छिपकर हकीकत को ही नकार रहा है। क्या अब सरकारी दफ्तरों में जमीन की सच्चाई फाइलों के रंग से तय होगी ?
9 शिकायतें, एक शपथ पत्र और सिस्टम का ‘मौन व्रत’..
एक किसान के लिए 9 बार जनसुनवाई की दहलीज लांघना किसी अग्निपरीक्षा से कम नहीं है। विनोद लाडे ने हर वो दरवाजा खटखटाया जिसे ‘न्याय का द्वार’ कहा जाता है, लेकिन बदले में मिली सिर्फ तारीखें और झूठे आश्वासन।
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शपथ पत्र की अनदेखी: एक नागरिक जब शपथ पत्र देता है, तो वह कानूनी रूप से अपनी बात की जिम्मेदारी लेता है। इसके बावजूद विभाग का टालमटोल रवैया यह दर्शाता है कि प्रशासनिक अधिकारी खुद को जवाबदेही से ऊपर समझने लगे हैं।
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दिखावटी जनसुनवाई: क्या जनसुनवाई केवल आंकड़ों का खेल बनकर रह गई है? जहाँ आवेदन तो लिए जाते हैं, लेकिन उनका समाधान केवल फाइलों में ‘डिस्पोज’ कर दिया जाता है।
ठेकेदार पर ‘मेहरबानी’ या मिलीभगत का खेल?
सवालों के घेरे में जल संसाधन विभाग का वह निजी ठेकेदार भी है जिसकी बिछाई गई पाइपलाइन आज किसान के लिए ‘अभिशाप’ बन गई है। जब ग्रामीणों का आरोप है कि ठेकेदार शिकायतों पर डराता-धमकाता है, तो प्रशासन की चुप्पी कई गहरे संदेह पैदा करती है। क्या ठेकेदार को प्राप्त ‘संरक्षण’ इतना मजबूत है कि एक पीड़ित किसान की कराह अधिकारियों के कानों तक नहीं पहुँच पा रही?
न्यायालय ही अंतिम उम्मीद ..
आज जब अन्नदाता अपनी ही जमीन पर बेबस खड़ा है, उसकी आर्थिक कमर टूट चुकी है और परिवार के भरण-पोषण पर संकट है, तब प्रशासन का ‘अमानवीय चेहरा’ पूरी तरह उजागर हो चुका है। खबर का खंडन करना नाकामी को छिपाने का सबसे सस्ता और घटिया तरीका है।
अब जबकि मामला न्यायालय की चौखट तक पहुँचने वाला है, यह स्पष्ट है कि प्रशासनिक तंत्र ने अपना विश्वास खो दिया है। यह केवल एक किसान की लड़ाई नहीं है, बल्कि उस प्रशासनिक शगल के खिलाफ जंग है जो सच को दबाने के लिए सरकारी तंत्र का दुरुपयोग करता है।
सीधा सवाल: क्या जिम्मेदार अधिकारियों पर कार्रवाई होगी, या फिर ‘जांच’ के नाम पर एक और फाइल धूल फांकने के लिए छोड़ दी जाएगी ?
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