श्रीकृष्णार्जुन संवाद धारावाहिक की सातवी कड़ी..   

मध्य प्रदेश के नरसिंगपुर जिले की माटी के मूर्धन्य साहित्यकार स्वर्गीय डॉक्टर रमेश कुमार बुधौलिया जी द्वारा रचित ‘श्रीकृष्णार्जुन संवाद ,धार्मिक साहित्यिक धरोहर है, जिसमे डॉक्टर साहब द्वारा श्रीमद्भगवतगीता  का भावानुवाद किया है ! श्रीमद्भगवतगीता के 700 संस्कृत श्लोकों को ‘श्रीकृष्णार्जुन संवाद में मात्र 697 विलक्ष्ण छंदों में समेटा गया है। गीता के समस्त अठारह अध्यायों का डॉ. बुधौलिया ने गहन अध्ययन करके जो काव्यात्मक प्रदेय हमें सौंपा है, वह अभूतपूर्व है। इतना प्रभावशाली काव्य-रूप बहुत कम देखने को मिलता है। जिनमें सहज-सरल तरीके से गीताजी को समझाने की सार्थक कोशिश की गई है।
इस दिशा में डॉ. बुधौलिया ने स्तुत्य कार्य किया। गीता का छंदमय हिंदी अनुवाद प्रस्तुत करके वह हिंदी साहित्य को दरअसल एक धरोहर सौंप गए।
आज वह हमारे बीच डॉ. बुधोलिया सशरीर भले नहीं हैं, लेकिन उनकी यह अमर कृति योगों युगों तक हिंदी साहित्य के पाठकों को अनुप्राणित करती रहेगी ! उन्ही के द्वारा श्रीमद्भगवतगीता महाकाव्य की छंदोंमयी श्रंखला श्रीकृष्णार्जुन संवाद धारावाहिक की सातवी कड़ी..       
पहला अध्याय : अर्जुन विषाद योग
हे पार्थ यहाँ से अब देखो, कौरव दल एकत्रित सारा,

सुन सकें भीष्म सुन सकें द्रोण, वाणी को ऐसा उच्चारा।

सुन सकें विश्व के नरपतिगण, जो वहाँ समर्थन को आये,

सुन सकें पुरोधा युद्धवीर, जो कुरूदल का प्रश्रय पाये।-25

 

श्वसुरों को सुजनों को देख, सब स्वजन दिखाई दिये उसे,

जो पितृतुल्य वे भूरिश्रवा, वे, भीष्म सोम पर पिता दिखे।

आचार्य द्रोण वे कृपाचार्य, मातुल वे शल्य शकुनि दीखे, वे बान्धव,

अनुज, पुत्र लक्ष्मण, अश्वत्थामा, कृतवीर्य दिखे।-26

 

सेनाओं के संकुल दीखे, दीखे उनमें सब मित्र स्वजन,

लख बन्धु-बान्धवों को रण में, अभिभूत हुआ अर्जुन का मन।

करूणार्द्र हुआ अत्यन्त दुखी, कौन्तेय विषाद भरे मन से,

कर रहा व्यक्त संयत होकर, प्रतिक्रिया अपनी यदुपति से महीपते।-27

 

अर्जुन उवाच :-

हे कृष्ण, देख अपने कुल को, जो यहाँ युद्ध की इच्छा से,

समवेत हुआ, एकत्रित है, मन मेरा भरा अनिच्छा से।

हो रहा शिथिल मेरा यह तन, रणक्षेत्र यहाँ सब खडे स्वजन,

है शिथिल देह का अंग अंग, मुख मेरा सूख रहा क्षण-क्षण।-28    क्रमशः…