रचित ‘श्रीकृष्णार्जुन संवाद ,धार्मिक साहित्यिक धरोहर है, जिसमे डॉक्टर साहब द्वारा श्रीमद्भगवतगीता का भावानुवाद किया है ! श्रीमद्भगवतगीता के 700 संस्कृत श्लोकों को ‘श्रीकृष्णार्जुन संवाद में मात्र 697 विलक्ष्ण छंदों में समेटा गया है। गीता के समस्त अठारह अध्यायों का डॉ. बुधौलिया ने गहन अध्ययन करके जो काव्यात्मक प्रदेय हमें सौंपा है, वह अभूतपूर्व है। इतना प्रभावशाली काव्य-रूप बहुत कम देखने को मिलता है। जिनमें सहज-सरल तरीके से गीताजी को समझाने की सार्थक कोशिश की गई है।दसवाँ अध्याय : विभूति-योग
(श्री भगवान का ऐश्वर्य )
हे अर्जुन मैं हूँ जगदीश्वर सम्पूर्ण सृष्टि का मैं उदगम्,
मैं मध्य रहा, मैं अन्त रहा मैं जन्म रहा मैं रहा मरण।
सब आगम निगम पुराण बीच, विधाओं में अध्यात्म रहा,
मैं तर्क वितर्क विवादों में, निर्णयकारी पर वाद रहा।-32
वैदिक साहित्य समग्र मध्य अक्षर में हूँ अकार अर्जुन,
मैं रहा समासों मध्य द्वन्द्व दोनों पद जिसमें सम अर्जुन ।
यह जग सब काल कलेवा है मैं, “काल” तत्व हूँ अविनाशी,
मुख सभी दिशाओं में जिसका, मैं ब्रह्मा आमुख प्रजापति।-33
सर्वस्वनाश करने वाला, मैं हूँ कृतान्त मैं मृत्यु पार्थ,
उत्पत्ति हेतु मैं ही कारण, मुझसे जीवन क्रम का विकास।
ऐश्वर्य सात गुण नारी के, हो जहाँ मुझे भासित करते,
मैं कीर्ति, वाक, श्री, स्मृति, मेधा धृति, क्षमा, व्यक्त मुझको करते।-34
मैं मन्त्रों में हूँ वृहत्साम, जो गान द्वन्द के लिये गेय,
छन्दों में हूँ गायत्री, जिसको जपते ब्बग्रह्मण सश्रेय।
महिनों में मैं हूँ मार्गशीर्ष धनधान्य पूर्ण प्रमुदित जीवन,
;तुओं में मैं रहता बसन्त, सम शीत घाम मुकुलित उपवन।-35
छल छद्म बीच मैं द्यूतकर्म, मैं तेज रहा तेजस्वियों का,
मैं विजय विजेताओं की हूँ, उद्यम मैं हूँ उद्यमियों का
मैं साहस परम साहसिकों का, बलवानों में मैं ही बल हूँ,
मैं हूँ प्रभाव, जय, साहस, बल, सबसे बढ़ चढ़कर मैं छल हूँ।-36
मैं पाण्डु सुतों में अर्जुन हूँ, वासुदेव वृष्णिवंशियों में,
मुनियों में हूँ मैं वेदव्यास, उशना हूँ कवि मनीषियों में।-37 क्रमशः…