श्रीकृष्णार्जुन संवाद धारावाहिक की 85वी कड़ी.. 

मध्य प्रदेश के नरसिंगपुर जिले की माटी के मूर्धन्य साहित्यकार स्वर्गीय डॉक्टर रमेश कुमार बुधौलिया जी द्वारा रचित ‘श्रीकृष्णार्जुन संवाद ,धार्मिक साहित्यिक धरोहर है, जिसमे डॉक्टर साहब द्वारा श्रीमद्भगवतगीता  का भावानुवाद किया है ! श्रीमद्भगवतगीता के 700 संस्कृत श्लोकों को ‘श्रीकृष्णार्जुन संवाद में मात्र 697 विलक्ष्ण छंदों में समेटा गया है। गीता के समस्त अठारह अध्यायों का डॉ. बुधौलिया ने गहन अध्ययन करके जो काव्यात्मक प्रदेय हमें सौंपा है, वह अभूतपूर्व है। इतना प्रभावशाली काव्य-रूप बहुत कम देखने को मिलता है। जिनमें सहज-सरल तरीके से गीताजी को समझाने की सार्थक कोशिश की गई है।
इस दिशा में डॉ. बुधौलिया ने स्तुत्य कार्य किया। गीता का छंदमय हिंदी अनुवाद प्रस्तुत करके वह हिंदी साहित्य को दरअसल एक धरोहर सौंप गए।
आज वह हमारे बीच डॉ. बुधोलिया सशरीर भले नहीं हैं, लेकिन उनकी यह अमर कृति योगों युगों तक हिंदी साहित्य के पाठकों को अनुप्राणित करती रहेगी ! उन्ही के द्वारा श्रीमद्भगवतगीता महाकाव्य की छंदोंमयी श्रंखला श्रीकृष्णार्जुन संवाद धारावाहिक की 85वी कड़ी.. 

दसवाँ अध्याय : विभूति-योग

(श्री भगवान का ऐश्वर्य )

 

हे योगेश्वर कृपया कहिये, किस तरह आपको पाऊँ मैं,

आच्छन्न योग माया से प्रभु, कैसे स्वरूप लख पाऊँ मैं।

किस भांति चिन्तवन मनन करूँ, किन किन रूपों में भजूँ देव,

ऐश्वर्य आपका अमित रहा, समझें उसको किस तरह देव।।-17

अमृतमय वचनों को सुनकर, होती है मुझको तृप्ति नहीं,

नित नित सुनते रहने की ही, बस एक भावना जाग रही।

अपनी विभूतियों का फिर से, प्रभु एक बार वर्णन करिये,

जिस योग शक्ति का यह वैभव, उससे मुझको परिचित करिये।-18

भगवानुवाच :-

अर्जुन हे कौरव श्रेष्ठ सुनो, भगवान कृष्ण ने विहँस कहा,

मेरी विभूतियाँ अनगिनती, मेरा ऐश्वर्य अनन्त रहा।

मैं मुख्य रूप से कुछ का ही, वर्णन कर करता समाधान,

उन सबको जान सके कोई, इस जग में यह संभव न मान।-19

 

सम्पूर्ण सृष्टि भासित जिससे, है गुणाकेश विश्वात्मा हूँ,

मैं जीव मात्र के हृदयों में, बसती है जो वह आत्मा हूँ।

मैं जीव मात्र का उद्गम हूँ मैं जीवमात्र का मध्य रहा,

मैं अन्त सभी जीवों का हूँ परमात्मा मैं अभिव्यक्त रहा।-20

 

मैं बारह अदिति सुतों में से हूँ विष्णुरूप परमेश्वर का,

जाज्वल्यमान जो ज्योति पुंज, उनमें स्वरूप मैं दिनकर का।

मैं मरूद गणों में हे अर्जुन, उनका अधीश्वर हूँ मरीचि,

अमृतवर्षी मैं शशि नभ का, नभ के समस्त नक्षत्र बीच।-21

 

मैं वेदों में हूँ सामवेद, सुरगण में मैं ही सुरपति हूँ,

मन हूँ मैं सभी इन्द्रियों में, जीवों में पार्थ चेतना हूँ।-22    क्रमशः…