श्रीकृष्णार्जुन संवाद धारावाहिक की 83वी कड़ी.. 

मध्य प्रदेश के नरसिंगपुर जिले की माटी के मूर्धन्य साहित्यकार स्वर्गीय डॉक्टर रमेश कुमार बुधौलिया जी द्वारा रचित ‘श्रीकृष्णार्जुन संवाद ,धार्मिक साहित्यिक धरोहर है, जिसमे डॉक्टर साहब द्वारा श्रीमद्भगवतगीता  का भावानुवाद किया है ! श्रीमद्भगवतगीता के 700 संस्कृत श्लोकों को ‘श्रीकृष्णार्जुन संवाद में मात्र 697 विलक्ष्ण छंदों में समेटा गया है। गीता के समस्त अठारह अध्यायों का डॉ. बुधौलिया ने गहन अध्ययन करके जो काव्यात्मक प्रदेय हमें सौंपा है, वह अभूतपूर्व है। इतना प्रभावशाली काव्य-रूप बहुत कम देखने को मिलता है। जिनमें सहज-सरल तरीके से गीताजी को समझाने की सार्थक कोशिश की गई है।
इस दिशा में डॉ. बुधौलिया ने स्तुत्य कार्य किया। गीता का छंदमय हिंदी अनुवाद प्रस्तुत करके वह हिंदी साहित्य को दरअसल एक धरोहर सौंप गए।
आज वह हमारे बीच डॉ. बुधोलिया सशरीर भले नहीं हैं, लेकिन उनकी यह अमर कृति योगों युगों तक हिंदी साहित्य के पाठकों को अनुप्राणित करती रहेगी ! उन्ही के द्वारा श्रीमद्भगवतगीता महाकाव्य की छंदोंमयी श्रंखला श्रीकृष्णार्जुन संवाद धारावाहिक की 83वी कड़ी.. 

दसवाँ अध्याय : विभूति-योग

(श्री भगवान का ऐश्वर्य )

श्री भगवानुवाच :-

सारे महर्षिगण सप्त ऋषि, इनके पहिले सनकादि चार,

फिर चौदह मनु मनवन्तर के, पच्चीस सृष्टि के सूत्रधार।

ये सभी प्रजापति भजते हैं, मेरा ही करते हैं चिन्तन,

सारा जग जग की प्रजा सभी, विधि आज्ञा पर चलती अर्जुन।-6

क्षेपक :-

सारा संसार प्रजा जिनकी, वे सब मुझसे उत्पन्न हुये,

जो हिरण्यगर्भ से थे जन्मे, वे प्रथम पुरुष ब्रह्म निकले

ब्रह्म से सात महर्षि हुए, उनके पीछे सनकादि चार,

फिर चौदह मनु मनवन्तर के पच्चीस प्रजापित हुए साथ।-अ

 

ब्रह्माण्ड लोक के सब प्राणी, सन्तान प्रजापति की बनते,

ब्रह्माण्ड असंख्य, असंख्य लोक ब्रह्माण्ड एक में है बसते ।

ब्रह्मा के दिव्य हजार वर्ष, यह अवधि घोर तप करने की,

पूरी कर ज्ञान प्राप्त करता, विधि अपनी सृष्टि विरचने की।-ब

 

बिखरा अद्भूत ऐश्वर्य सकल, बिखरी है योग शक्ति मेरी,

असमोर्ध्व तत्व का बोध जिसे, जानी जिसने महिमा मेरी।

यह रहा सहज स्वाभाविक ही, आता वह मेरी शरण पार्थ,

हो भक्ति परायण वह अनन्य, तत्वार्थ प्राप्त करता यथार्थ।-7

यह प्राकृत जग बैकुण्ठ धाम, इन दोनों का है मैं कारण,

उत्पन्न सभी कुछ मुझसे है, संचालित है मुझसे जीवन।

इस तरह तत्व से समझ मुझे, मेरा करते हैं भक्त भजन,

प्रेमापूरित अन्तस लेकर, ले विनतभाव श्रद्धामय मन।-8

 

ये परम भक्त मेरे अर्जुन, करते रहते मेरा चिन्तन,

मेरी सेवा करते रहते, उनका मुझमें ही रहा रमण।

वार्ता करते, महिमा गाते, अतुलित आनन्द मनाते वे,

महिमा का करके बोध स्वयं, हुलसित पुलकित हो जाते वे।-9

 

ये भक्ति परायण भक्त सदा, सच्चे मन से गुण गान करे,

हृदय में प्रेम भाव लेकर, ये भक्त निरंतर मुझे भजें।

मैं इनकी बुद्धि विमल करता, देता हूँ इनको बुद्धि योग,

ये कर्म-निरत पर मुक्त रहे, इनको न सताता फिर वियोग।-10   क्रमशः…