श्रीकृष्णार्जुन संवाद धारावाहिक की 82वी कड़ी.. 

मध्य प्रदेश के नरसिंगपुर जिले की माटी के मूर्धन्य साहित्यकार स्वर्गीय डॉक्टर रमेश कुमार बुधौलिया जी द्वारा रचित ‘श्रीकृष्णार्जुन संवाद ,धार्मिक साहित्यिक धरोहर है, जिसमे डॉक्टर साहब द्वारा श्रीमद्भगवतगीता  का भावानुवाद किया है ! श्रीमद्भगवतगीता के 700 संस्कृत श्लोकों को ‘श्रीकृष्णार्जुन संवाद में मात्र 697 विलक्ष्ण छंदों में समेटा गया है। गीता के समस्त अठारह अध्यायों का डॉ. बुधौलिया ने गहन अध्ययन करके जो काव्यात्मक प्रदेय हमें सौंपा है, वह अभूतपूर्व है। इतना प्रभावशाली काव्य-रूप बहुत कम देखने को मिलता है। जिनमें सहज-सरल तरीके से गीताजी को समझाने की सार्थक कोशिश की गई है।
इस दिशा में डॉ. बुधौलिया ने स्तुत्य कार्य किया। गीता का छंदमय हिंदी अनुवाद प्रस्तुत करके वह हिंदी साहित्य को दरअसल एक धरोहर सौंप गए।
आज वह हमारे बीच डॉ. बुधोलिया सशरीर भले नहीं हैं, लेकिन उनकी यह अमर कृति योगों युगों तक हिंदी साहित्य के पाठकों को अनुप्राणित करती रहेगी ! उन्ही के द्वारा श्रीमद्भगवतगीता महाकाव्य की छंदोंमयी श्रंखला श्रीकृष्णार्जुन संवाद धारावाहिक की 82वी कड़ी.. 

दसवाँ अध्याय : विभूति-योग

(श्री भगवान का ऐश्वर्य )

श्री भगवानुवाच :-

भगवान कृष्ण ने कहा सखे, मम परम वचन आगे भी सुन,

जो तुझे समझकर अपना प्रिय, करने तेरा हित सम्वर्द्धन ।

अर्जुन मैं तेरे प्रति कहता, जिनमें तेरा कल्याण निहित,

अरू जिन वचनों को सुनकर तू, होगा रे अतिशय आनन्दित।-1

 

ऐश्वर्य पूर्ण मेरा उदभव, कोई न बता सकता अर्जुन,

इसको न महर्षि बता सकते, इसको न जानते हैं सुरगण।

इसलिये कि कारणों का कारण देवों का हूँ मैं आदिबीज,

हूँ आदिबीज महर्षियों का, मैं आदिबीज से हूँ अतीत।-2

 

मैं हूँ सब लोको का स्वामी, परमेश्वर हूँ मैं तत्व अगम

मेरा न हुआ है जनम कभी, मेरा न कहीं कोई उद्गम ।

जिसने इस तरह मुझे जाना, वह रहा मनुष्यों में ज्ञानी,

वह मुक्त रहा सब पापो से, वह रहा श्रेष्ठ सबसे प्राणी।-3

 

जीवों के भाव अभावों का, हे अर्जुन मैं ही हूँ कारण,

मैं कारण ज्ञान बुद्धि का हूँ, सम्मोह मुक्ति का मैं कारण

कारण मैं क्षमा सत्य का हूँ, शम, दम का कारण हूँ मैं ही

सुख दुख का जन्म-मरण का भी, भय-अभय भाव कारण मैं ही।-4

 

कारण मैं रहा अहिंसा का, समता का कारण मुझे जान,

तप, तुष्टि, दान का कारण भी हे अर्जुन केवल मुझे मान।

यश, अपयश, अशान्ति-शान्ति मन की होती है सब मेरे कारण,

जीवों के भाव अभावों की संरचना सब मेरे कारण।-5       क्रमशः…