श्रीकृष्णार्जुन संवाद धारावाहिक की 81वी कड़ी.. 

मध्य प्रदेश के नरसिंगपुर जिले की माटी के मूर्धन्य साहित्यकार स्वर्गीय डॉक्टर रमेश कुमार बुधौलिया जी द्वारा रचित ‘श्रीकृष्णार्जुन संवाद ,धार्मिक साहित्यिक धरोहर है, जिसमे डॉक्टर साहब द्वारा श्रीमद्भगवतगीता  का भावानुवाद किया है ! श्रीमद्भगवतगीता के 700 संस्कृत श्लोकों को ‘श्रीकृष्णार्जुन संवाद में मात्र 697 विलक्ष्ण छंदों में समेटा गया है। गीता के समस्त अठारह अध्यायों का डॉ. बुधौलिया ने गहन अध्ययन करके जो काव्यात्मक प्रदेय हमें सौंपा है, वह अभूतपूर्व है। इतना प्रभावशाली काव्य-रूप बहुत कम देखने को मिलता है। जिनमें सहज-सरल तरीके से गीताजी को समझाने की सार्थक कोशिश की गई है।
इस दिशा में डॉ. बुधौलिया ने स्तुत्य कार्य किया। गीता का छंदमय हिंदी अनुवाद प्रस्तुत करके वह हिंदी साहित्य को दरअसल एक धरोहर सौंप गए।
आज वह हमारे बीच डॉ. बुधोलिया सशरीर भले नहीं हैं, लेकिन उनकी यह अमर कृति योगों युगों तक हिंदी साहित्य के पाठकों को अनुप्राणित करती रहेगी ! उन्ही के द्वारा श्रीमद्भगवतगीता महाकाव्य की छंदोंमयी श्रंखला श्रीकृष्णार्जुन संवाद धारावाहिक की 81वी कड़ी.. 

नौवां अध्याय : राजविद्या-राजगुह्य योग

 

आकस्मिक जिसका हुआ पतन, जो अतिशय रहा दुराचारी,

यदि भक्ति परायण हो जाये, वह बने मुक्ति का अधिकारी।

इसलिए कि साधुता धारण, की-मन भक्ति भाव से युक्त हुआ,

निष्ठा एकान्त साधकर वह, मानों मुझसे संयुक्त हुआ।-30

 

अविलम्बन बने वह धर्मात्मा, पा जाये अमित शान्ति मेरी,

जो धर्म परायण भक्त उसे, यह परम शान्ति मिलती मेरी।

निश्चय पूर्वक हे अर्जुन तू, कर दे उद्घोष, जगत सुन ले,

मरता है मेरा भक्त नहीं, चाहे कोई भी कुछ कर ले।-31

 

जो भक्ति भाव धारण करके, कौन्तेय शरण मेरी आता,

कोई भी हो बिन भेदभाव, वह मेरा परम धाम पाता।

चाहे वह पाप योनि का हो, या तमोगुणी उसका वर्तन,

पापात्मा हो या नारी, या वैश्य, शूद्र सब का तर्पण।-32

 

फिर उनके प्रति क्या कहने को, जो ब्राहाण पुण्य परायण है,

राजर्षि भक्तगण जिन सबका, मेरे प्रति पूर्ण सर्मपण है।

इसलिये पार्थ क्षण भंगुर तन, सुख रहित जगत में रहकर तू,

बस भक्ति भावना भाषित हो, एकाग्र चित्त मुझको भज तू।-33

 

तू नित्य निरंतन चिन्तन कर, मेरे स्वरूप का हे अर्जुन,

परतत्व रहा पुरुषोत्तम मै, कर भक्तिभाव परिपूरित मन।

मेरा कर पूजन कर प्रणाम, तू पूर्ण रूप तन्मय हो जा,

रे प्राप्त करेगा मुझको ही, रे अर्जुन तू मुझमें खो जा।-34

॥ इति नवम अध्याय ॥