श्रीकृष्णार्जुन संवाद धारावाहिक की 63 वी कड़ी ..

मध्य प्रदेश के नरसिंगपुर जिले की माटी के मूर्धन्य साहित्यकार स्वर्गीय डॉक्टर रमेश कुमार बुधौलिया जी द्वारा रचित ‘श्रीकृष्णार्जुन संवाद ,धार्मिक साहित्यिक धरोहर है, जिसमे डॉक्टर साहब द्वारा श्रीमद्भगवतगीता  का भावानुवाद किया है ! श्रीमद्भगवतगीता के 700 संस्कृत श्लोकों को ‘श्रीकृष्णार्जुन संवाद में मात्र 697 विलक्ष्ण छंदों में समेटा गया है। गीता के समस्त अठारह अध्यायों का डॉ. बुधौलिया ने गहन अध्ययन करके जो काव्यात्मक प्रदेय हमें सौंपा है, वह अभूतपूर्व है। इतना प्रभावशाली काव्य-रूप बहुत कम देखने को मिलता है। जिनमें सहज-सरल तरीके से गीताजी को समझाने की सार्थक कोशिश की गई है।
इस दिशा में डॉ. बुधौलिया ने स्तुत्य कार्य किया। गीता का छंदमय हिंदी अनुवाद प्रस्तुत करके वह हिंदी साहित्य को दरअसल एक धरोहर सौंप गए।
आज वह हमारे बीच डॉ. बुधोलिया सशरीर भले नहीं हैं, लेकिन उनकी यह अमर कृति योगों युगों तक हिंदी साहित्य के पाठकों को अनुप्राणित करती रहेगी ! उन्ही के द्वारा श्रीमद्भगवतगीता महाकाव्य की छंदोंमयी श्रंखला श्रीकृष्णार्जुन संवाद धारावाहिक की 63 वी कड़ी ..     

छटवाँ अध्याय : – ध्यान-योग (अभ्यास)

पुण्यात्माओं के लोकों में वर्षों तक सुख उपभोग करें,

फिर लेकर जन्म धरा पर वह, अपनी अपूर्णता पूर्ण करें।

कुल जहाँ जन्म होता उसका, सम्पन्न शुद्ध सात्विक रहता,

वह योग भ्रष्ट फिर जीवन में, निज-दर्शन का अवसर गहता।-41

 

अथवा जो पथच्यूत है योगी, जाता न दूसरे लोक कहीं,

ज्ञानी कुल में जन्म पुनः, पूरा करता सत्कर्म यही।

कुल ज्ञानवान योगी का हो, यह अतिशय दुर्लभ बात रही,

कुल ऐसे विद्यमान जग में, जिन पर हरिकृपा विशेष रही।-42

 

हे अर्जुन, उस शरीर में वह, फिर बुद्धि योग अपना पाता,

जन्मान्तर जिसके लिये लगे, वह पुण्य पर्व वह पा जाता।

इस तरह योग से युक्त पुरुष, संसिद्धि हेतु साधना करता,

होता है सफल अन्ततः वह, परमोच्च शिखर को वह वरता।-43

 

पिछले अभ्यासों का प्रभाव, उसको फिर फिर आकृष्ट करे,

असहाय हुआ फिर बुद्धि-योग, साधन में वह आगे उतरे।

ऐसा जिज्ञासु बुद्धि-योगी, दुर्लक्ष्य विधानों का करता,

वह योग सिद्धि के लिए नहीं, वैदिकता का पालन करता।-44

अभ्यास सतत करते रहकर, सप्रयत्न एक दिन भवरोगी,

जन्मों जन्मों की शुद्धि बाद, हो जाता शुद्ध कर्म योगी।

निर्मल मति, पाप न रह जाते, परमोच्च अवस्था को पाता,

वह मोह द्वन्द्व से मुक्त हुआ, हे पार्थ परम गति पा जाता।-45

 

वह रहा श्रेष्ठ तपस्वियों से, वह श्रेष्ठ ज्ञानियों से योगी,

वह श्रेष्ठ सकाम कर्मियों से योगी वह रहा कर्म योगी।

हो कर्मयोग या ज्ञान योग या भक्ति योग या योगमात्र,

तु सब प्रकार से योगी बन, हे अर्जुन, तू यह योग साध।-46

 

अन्यान्य योगियों में योगी, जो श्रद्धा विनय परायण हो,

नित मेरा चिन्तन किया करे, जो मुझमे भक्ति परायण हो।

सेवा में जो संलग्न रहे, वह मुझसे युक्त रहा योगी,

हो पूर्ण रूप भावित मुझसे, अर्जुन वह परम श्रेष्ठ योगी।-47

॥इति षष्टम अध्याय ।