रचित ‘श्रीकृष्णार्जुन संवाद ,धार्मिक साहित्यिक धरोहर है, जिसमे डॉक्टर साहब द्वारा श्रीमद्भगवतगीता का भावानुवाद किया है ! श्रीमद्भगवतगीता के 700 संस्कृत श्लोकों को ‘श्रीकृष्णार्जुन संवाद में मात्र 697 विलक्ष्ण छंदों में समेटा गया है। गीता के समस्त अठारह अध्यायों का डॉ. बुधौलिया ने गहन अध्ययन करके जो काव्यात्मक प्रदेय हमें सौंपा है, वह अभूतपूर्व है। इतना प्रभावशाली काव्य-रूप बहुत कम देखने को मिलता है। जिनमें सहज-सरल तरीके से गीताजी को समझाने की सार्थक कोशिश की गई है। मन से, उत्पन्न वासना का, जो विषयों हित मन में उपजे ।
अरू रहे पूर्ण संतुष्ट चित्त, आत्मा में भाव प्रतिष्ठित कर,
तब सुस्थिर बुद्धि हुआ समझो, वह स्थित-प्रज्ञ रहा नश्वर।-55
तीनो प्रकार के दुख में मन, जिसका उद्वेग रहित रहता
सुख में रहता स्पृहा-शून्य, समभाव हुआ सुख-दुख सहता।
जिसके मन में आसक्ति नहीं, भय से विमुक्त जिसका मन हो,
हो मुक्त क्रोध से जिसका मन, सुस्थिर मति मुनि कहते उसको।-56
सर्वत्र रहा वह स्नेह रहित, शुभ में जो आनन्दित न हुआ,
जो नहीं अशुभ में हुआ दुखी, वह पूर्ण ज्ञान में निष्ट हुआ।
अप्रभावित रहता द्वन्द्वो में, जिसके न चित्त में हो हलचल,
पाता समाधि वह सत्वमयी, वह स्थित प्रज्ञ रहा अविचल।-57
अपने सब अंगों को कछुवा, सब तरफ समेट लेता है ज्यों,
विषयों से सभी इन्द्रियों को, जो पुरुष हटा सकता है त्यों।
हो गई बुद्धि स्थिर उसकी, वह ज्ञान हुआ यथार्थ परम,
अधिकार इन्द्रियों पर उसका, वश में उसके है उसका मन।-58 क्रमशः..