रचित ‘श्रीकृष्णार्जुन संवाद ,धार्मिक साहित्यिक धरोहर है, जिसमे डॉक्टर साहब द्वारा श्रीमद्भगवतगीता का भावानुवाद किया है ! श्रीमद्भगवतगीता के 700 संस्कृत श्लोकों को ‘श्रीकृष्णार्जुन संवाद में मात्र 697 विलक्ष्ण छंदों में समेटा गया है। गीता के समस्त अठारह अध्यायों का डॉ. बुधौलिया ने गहन अध्ययन करके जो काव्यात्मक प्रदेय हमें सौंपा है, वह अभूतपूर्व है। इतना प्रभावशाली काव्य-रूप बहुत कम देखने को मिलता है। जिनमें सहज-सरल तरीके से गीताजी को समझाने की सार्थक कोशिश की गई है। फल की इच्छा का हेतु न बन, मत हो रे तू कर्तव्य-विमुख,
निष्काम कर्म से मुक्ति मिले, आसक्ति कर्म फल की न उचित।-47
हे अर्जुन तू योगरथ हुआ, अपने मन में समभाव साध,
मत कर कि फलाफल का विचार, कर विहित कर्म, आसक्ति त्याग।
यह योग रहा, यह है समत्व, अर्जुन तू इसका कर पालन,
कर्तव्य पूर्ण कर तू अपना, समभाव हृदय में धारण।-48
जो कमफलों के अभिलाषी, वे बन्धन मुक्त न हो पाते,
फँस जन्म-मृत्यु के घेरे मे, वे दीन-हीन गिरते जाते।
बन्धनकारी वे कर्म रहे, जिनके फल की मन में इच्छा,
इसलिये धनंजय तू समत्व धारण कर, कर अपनी रक्षा।-49
जीवन में भक्ति से मिलती, समबुद्धि युक्त जो पुरुष हुआ,
क्या पाप रहा, क्या पुण्य रहा, जिसके मन में यह भेद गया।
इस भक्ति योग का साधन कर, अर्जुन है यही कर्म-कौशल,
यह सिद्ध साधना जीवन की, जीवन प्राणों का यह सम्बल।-50 क्रमशः…